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सुपेबेड़ा में मौत का तांडव आज भी जारी, ग्रामीण किडनी की बीमारी से मरने को मजबूर….

रायपुर. सुपेबेड़ा में किडनी पीड़ितों के इलाज के नाम पर मजाक हो रहा है. सरकार जिस व्यवस्था करने की कर रही बात है, धरातल पर सभी फेल है. बोर से निकलने वाला पानी आज भी संक्रमित है. मशीन आज तक धूल खा रही है. डायलिसिस करने डॉक्टर डरते हैं. कुल मिलाकर सुपेबेड़ा में मौत का तांडव आज भी जारी है.

सरकारी आंकड़ों की माने तो 70 लोगों की मौत हुई है, लेकिन ग्रामीणों की मानें तो अब तक 111 लोग काल के गाल में समा चुके हैं. 16 सौ जनसंख्या वाले गांव में 111 लोगों की मौत और 200 लोग किडनी की बीमारी से जूझते हुए तेजी से मौत के करीब पहुंच रहे हैं. इनमें केवल बुजुर्ग ही नहीं बल्कि बच्चे तक शामिल है. ग्रामीण गांव में उचित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं.

अपने परिवार के 17 सदस्य को किडनी की बीमारी से खो चुके त्रिलोचन सोनवानी ने बताया कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर वाहवाही लूटने में लगी है, चाहे पूर्व बीजेपी सरकार हो या वर्तमान कांग्रेस की सरकार, पूर्व सरकार ने किडनी पीड़ितों के इलाज के जो भी व्यवस्था की बात की वो सारे बेबुनियादी है.

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सरकार की पोल खोलते हुए सुपेबेड़ा निवासी त्रिलोचन सोनवानी ने बताया कि आज रोटी-बेटी के रिश्ते से समाज से सुपेबेड़ा कट गया है. स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर जो डायलिसिस मशीन भेजा गया जो आज तक चालू नहीं हुआ है, जो दो बोर कराया गया है वो भी संक्रमित है. उसने बताया कि अपने परिवार के 17 सदस्य को किडनी के बीमारी से खो चुके अब उनकी पत्नी भी किडनी पीड़ित है, जिसका इलाज रायपुर के डीकेएस में चल रहा है.

एक्सपर्ट नहीं होने की वजह से मशीन बेकार

जिला चिकित्सा अधिकारी एनआर नवरत्न ने बताया कि लगभग दो साल पहले डायलिसिस मशीन राजधानी से सुपेबेड़ा के लिए भेजा गया है, लेकिन आज तक किसी भी मरीज़ का इसका फ़ायदा नहीं मिल पाया है. मशीन चलाने के लिए एक्सपर्ट डॉक्टर की ज़रूरत है, जो गरियाबंद में नहीं है. कैंप लगाने या अस्पतालों से पता चलता है कि जिन मरीज़ों को डायलिसिस की ज़रूरत है, उन्हें राजधानी रायपुर के डीकेएस हॉस्पिटल और रामकृष्ण केयर भेजा जाता है, यहाँ मरीज़ों का निःशुल्क इलाज होता है.

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