हमारी राष्ट्रीयता आध्यात्मिक, चेतनशील

राष्ट्रवाद सर्व फलित है और हर राष्ट्र राष्ट्रीयता से फलित हो रहा है। भारत की राष्ट्रीयता यूरोपीय राष्ट्रीयता नहीं है। जिसका उदय सामंतवाद को खत्म करने के फलस्वरूप हुआ है।

रायपुर: राष्ट्रवाद सर्व फलित है और हर राष्ट्र राष्ट्रीयता से फलित हो रहा है। भारत की राष्ट्रीयता यूरोपीय राष्ट्रीयता नहीं है। जिसका उदय सामंतवाद को खत्म करने के फलस्वरूप हुआ है। हमारी राष्ट्रीयता आध्यात्मिक, चेतनशील है। जिसमें वसुदेव कुटुम्बकम की भावना है। हमारी राष्ट्रीयता ऐसी होना चाहिये जिससे पूरी दुनिया में हमारी अलग पहचान बन सके।

यह बातें पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व अध्ययनशाला और सरस्वती शिक्षा संस्थान, छत्तीसगढ़ प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में वर्तमान परिवेश में राष्ट्रीयता: आवश्यकता और चुनौतियाँ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस समापन सत्र में विद्वानों कहीं। 

राष्ट्रीय संगोष्ठी के सह-संयोजक पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय समाजशास्त्र अध्ययनशाला के सहायक प्राध्यापक डॉ. लुकेश्वर सिंह गजपाल ने कहा कि राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस तृतीय और चतुर्थ तकनीकी सत्र में विषय विशेषज्ञों, अतिथियों ने अपने विचार रखे। प्राध्यापकों और शोधार्थियों ने शोध पत्रों की प्रस्तुति दी। 

किसने क्या कहा : 

उच्च शिक्षा विभाग के पूर्व अतिरिक्त संचालक प्रो. युगल किशोर भारती ने कहा कि हमारी राष्ट्रीयता यूरोपीय राष्ट्रीयता जैसी नहीं है, हमारी राष्ट्रीयता चेतनशील, आध्यात्मिक राष्ट्रीयता है। हमारी राष्ट्रीयता भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस जैसे देशभक्तों में है जो किसी भी तरह से भारत को आजाद कराना चाहते थे। उन्होंने कहा कि हमारी राष्ट्रीयता ऐसी होना चाहिए। जिससे हम अंतर्राष्ट्रीय जगत में सम्मानीय हों, हमारी राष्ट्रीयता अभी विकसित हो रही है। तृतीय तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता शासकीय दीनवीर तुलाराम महाविद्यालय उतई के प्राचार्य डॉ. महेश चंद्र शर्मा थे। 

चतुर्थ तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मानसिंह परमार ने कहा कि भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है और हमारी संस्कृति, शिक्षा समृद्ध रही है। हमारे देश में भाई-बहन का रिश्ता इतना मजबूत है। जितना किसी अन्य देशों में नहीं है। हमारा देश वासुदेव कुटुम्बकम की भावना को धारण करता है। भारत माँ सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, हमारा भावनात्मक लगाव है। डॉ. परमार ने शोध कार्यों में गुणवत्ता पर भी जोर दिया। तथा कहा कि हम शोध के क्षेत्र में भी आगे बढ़ें। पं. सुंदरलाल शर्मा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. वंश गोपाल सिंह ने कहा कि भ्रष्ट्राचार में लिप्त व्यक्ति में राष्ट्रीयता की भावना नहीं होती और आज शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने के लिए रह गई है। 

भारत में यदि 25 प्रतिशत लोगों में भी राष्ट्रीयता की भावना का विकास हो जाए तो भारत को विश्व गुरू बनने से कोई नहीं रोक सकता। तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मुकेश वर्मा ने कहा कि कक्षाओं में पढ़ाई के साथ-साथ ऐसी कक्षाओं का भी होना चाहिए। जिसमें विद्यार्थियों को राष्ट्रीयता के संबंध में शिक्षा दी जा सके। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीयता की परिभाषा चाहे किसी भी रूप में करें, यह भौगोलिकता की सीमाओं से परे है, यह भावनात्मक है। 

राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष चंद्रशेखर साहू ने कहा कि राष्ट्रवाद सम्पूर्ण जगत में फैला है। आज की परिस्थितियों में राष्ट्रवाद से यूरोप भी अचूका नहीं है। डोनाल्ड ट्रम्प की जीत का कारण भी राष्ट्रवाद है। राष्ट्रवाद की वजह से इजरायल भी आज खड़ा हो पाया है। राष्ट्रवाद राष्ट्रीय स्तर पर हो अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, चरम पर होना चाहिए। आज भारत एक जन, एक राष्ट्र, एक भारत श्रेष्ठ भारत की ओर बढ़ रहा है। जो सिर्फ एक नारा नहीं है बल्कि शाश्वत सत्य है। 

दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा राष्ट्रीयता से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 100 से ज्यादा शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। समापन के अवसर पर सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किये गए।

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