ट्रायल में सुरक्षित और इम्यून को मजबूत करने में सफल साबित हुई ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन

परीक्षण में करीब 1,077 लोगों को शामिल किया गया

नई दिल्ली: ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन ट्रायल में सुरक्षित और इम्यून को मजबूत करने में सफल साबित हुई है. इसके नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे. परीक्षण में करीब 1,077 लोगों को शामिल किया गया और पाया कि जिन्हें वैक्सीन दी गई उनमें एंटीबॉडी और व्हाइट ब्लड सेल्स बने जो कोरोना वायरस से लड़ने में सक्षम थे.

अभी इसका बड़े पैमाने पर ट्रायल बाकी है. ब्रिटेन ने पहले ही वैक्सीन की 10 करोड़ डोज सुरक्षित कर ली हैं. भारत में भी इस वैक्सीन का उत्पादन हो रहा है. पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को ऑक्सफोर्ड वैक्सीन का उत्पादन करने का जिम्मा मिला है.

कोरोना वायरस की वैक्सीन की दौड़ में फिलहाल ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन ही सबसे आगे है. एक तरफ जहां कई वैक्सीन अपने अंतिम चरण या एडवांस स्टेज में पहुंचने वाली हैं, वहीं ऑक्सफोर्ड वैक्सीन इस चरण में पहले से ही है. अगर सब कुछ सही रहा तो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका द्वारा तैयार ये वैक्सीन सितंबर तक लोगों के लिए आ जाएगी.

वैक्सीन सितंबर तक

ऑक्सफोर्ड की प्रोफेसर सारा गिल्बर्ट ने कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में अहम भूमिका निभाई है. सारा गिल्बर्ट इस वैक्सीन के तीसरे और फाइनल स्टेज का भी नेतृत्व कर रही हैं. गिल्बर्ट का दावा है कि ऑक्सफोर्ड वैक्सीन कोरोना वायरस से लोगों को बचाने में 80 फीसदी तक प्रभावी है. गिल्बर्ट का कहना है लोगों को ठंड के मौसम में वायरस की मार नहीं झेलनी पड़ेगी क्योंकि ये वैक्सीन सितंबर तक आ जाएगी.

जहां कई वैक्सीन अपने अंतिम चरण में पहुंचने वाले हैं वहीं ऑक्‍सफोर्ड वैक्‍सीन 10,000 लोगों पर अपना आखिरी ट्रायल खत्म करने वाली है. वैक्सीन टास्कफोर्स की अध्यक्ष केट बिंघम का कहना है, ‘ये वैक्सीन पूरी दुनिया में सबसे आगे है और ये किसी भी वैक्सीन से सबसे ज्यादा एडवांस है.

आम वैक्सीन से कैसे है अलग? एक तरफ जहां दवाओं का काम बीमारियों को ठीक करना है, वहीं वैक्सीन का काम स्वस्थ लोगों को बीमारी से बचाना है. इसलिए इसे उच्च मानकों पर ही मंजूरी दी जाती है. मंजूरी देने से पहले सालों तक चले इसके सारे डेटा का निरीक्षण किया जाता है.

वैक्सीन को मंजूरी

हालांकि कोरोना वायरस महामारी के दौरान ये अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है कि नियामक संस्थाएं एक सफल और सुरक्षित वैक्सीन के लिए प्रमाण के रूप में क्या स्वीकार करेंगी. US फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन का कहना है कि प्लेसिबो की तुलना में 50 फीसदी ज्यादा प्रभावी होने पर ही वैक्सीन को मंजूरी दी जाएगी.

आम वैक्सीन संक्रमण का कारण बनने वाले कमजोर या निष्क्रिय रोगाणु पर प्रयोग कर बनाए जाते हैं. लेकिन वैक्सीन को बनाना आसान नहीं है और इसमें कई साल लग जाते हैं. ऑक्सफोर्ड टीम ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें हानिरहित वायरस का इस्तेमाल करके ये प्रक्रिया तेज की जा सकती है.

गिल्बर्ट ने बताया कि कुछ वैक्सीन संक्रमण को रोकते नहीं हैं लेकिन बीमारी से बचाने के लिए इम्यून सिस्टम को मजबूत करते हैं. जैसे कि पोलियो वैक्सीन संक्रमण होने से नहीं रोकती है, लेकिन लाखों लोगों को इस बीमारी से बचाती है. Covid-19 के मामले में प्रोफेसर गिल्बर्ट ने एक चिंपैंजी एडिनोवायरस (एक सामान्य ठंडा वायरस) लिया है और जेनेटिक मैटेरियल को SARS-CoV-2 वायरस के स्पाइक प्रोटीन से इंसर्ट किया है.

सारा गिल्बर्ट का कहना है कि कोरोना के वैक्सीन की दौड़ में भले ही कोई भी जीते लेकिन बाजी मारने वाली वैक्सीन भी 100 फीसदी असरदार नहीं हो सकती है. कोई भी वैक्सीन वो इम्यूनिटी नहीं बनाती हैं, जिससे वायरस को रोकने वाली न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी पैदा होती है.

कैसे बनती है वैक्सीन?

कैसे बनती है वैक्सीन? इंसानी शरीर में खून में व्हाइट ब्लड सेल होते हैं जो उसके रोग प्रतिरोधक तंत्र का हिस्सा होते हैं. बिना शरीर को नुकसान पहुंचाए वैक्सीन के जरिए शरीर में बेहद कम मात्रा में वायरस या बैक्टीरिया डाल दिए जाते हैं.

जब शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र इस वायरस या बैक्टीरिया को पहचान लेता है तो शरीर इससे लड़ना सीख जाता है. इसके बाद अगर इंसान असल में उस वायरस या बैक्टीरिया का सामना करता है तो उसे जानकारी होती है कि वो संक्रमण से कैसे निपटे.

दशकों से वायरस से निपटने के लिए जो टीके बने उनमें असली वायरस का ही इस्तेमाल होता आया है. मीजल्स, मम्प्स और रुबेला (एमएमआर यानी खसरा, कण्ठमाला और रुबेला) टीका बनाने के लिए ऐसे कमजोर वायरस का इस्तेमाल होता है जो संक्रमित नहीं कर सकते. साथ ही फ्लू की वैक्सीन में भी इसके वायरस का ही इस्तेमाल होता है.

ब्रिटेन के अलावा, चीन की सिनोवैक और अमेरिका की वैक्सीन भी ह्यूमन ट्रायल के एडवांस स्टेड में हैं. पूरी दुनिया बेसब्री से कोरोना की वैक्सीन आने का इंतजार कर रही है.

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