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पाकिस्तान की सेना तय करेगी पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को फांसी, जाने वजह

पाकिस्तान में संविधान के उल्लंघन पर पूर्व राष्ट्रपति को फांसी की सज़ा

इस्लामाबाद: पाकिस्तान में संविधान के उल्लंघन पर पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को फांसी की सज़ा दी गई है. पाकिस्तान की राजनीति में षड़यंत्र हमेशा से एक अहम किरदार अदा करता रहा है. वर्ष 2014 में इस केस में मुशर्रफ को दोषी साबित किया गया था. इसके बाद वर्ष 2016 में मुशर्रफ ने पाकिस्तान छोड़ दिया था और तब से वो दुबई में रहकर अपना इलाज करा रहे हैं.

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेश मुशर्रफ ऐसी षड़यंत्रकारी राजनीति का जीता जागता प्रमाण हैं. पाकिस्तान की विशेष अदालत ने 77 वर्षीय परवेज मुशर्रफ को राजद्रोह के मामले में फांसी की सजा सुनाई है.

सबसे पहले आप ये समझिए कि परवेज मुशर्रफ पर क्या इल्जाम लगाए गए हैं और क्या 77 वर्ष की उम्र में मुशर्रफ अपनी सबसे मुश्किल चुनौती का मुकाबला कर पाएंगे? 9 वर्षों तक पाकिस्तान पर शासन करने वाले परवेज मुशर्रफ पर, पाकिस्तान में वर्ष 2007 में इमरजेंसी लगाकर संविधान का उल्लंघन करने का आरोप है. वर्ष 2013 में उन पर केस चलाया गया था.

फौज और तख्‍तापलट

पाकिस्तान में फांसी और सजा को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है. ऐसा लगता है जैसे सत्ता से बाहर जाते ही पाकिस्तान के नेताओं के लिए जेल जाने के दरवाजे खुल जाते हैं.

वर्ष 2018 में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को 7 साल की सज़ा हुई थी. शायद यही वजह है कि आज पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मुशर्रफ के पक्ष में बयान दिया है. जबकि 20 वर्ष पहले साल 1999 में मुशर्रफ ने ही नवाज शरीफ सरकार का तख्तापलट किया था. इसके बाद भी आज नवाज शरीफ…मुशर्रफ के साथ दिखाई दे रहे हैं.

प्रधानमंत्री इमरान खान

अभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान हैं लेकिन उन्हें भी Elected नहीं Selected प्रधानमंत्री कहा जाता है. ये कहा जाता है कि वो एक कठपुतली की तरह पाकिस्तान की सेना के आदेशों का पालन करते हैं . पाकिस्तान में पिछले 72 वर्षों में करीब 31 साल तक सेना का शासन रहा है. और इसकी शुरुआत पाकिस्तान को आजादी मिलने के 11 वर्षों के बाद ही हो गई थी.

वर्ष 1958 में जनरल अयूब खान ने पाकिस्तान में पहली बार मार्शल लॉ लगाया था. ये पाकिस्तान में सेना के तानाशाही वाले शासन की शुरुआत थी. वर्ष 1977 में पाकिस्तान के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल जिया उल हक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्ता पलट किया था .

वर्ष 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दे दी गई थी. भुट्टो पर आरोप था कि उन्होंने अपने राजनैतिक विरोधी कि हत्या करवाई थी. यानी सिर्फ 2 साल से कम वक्त में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो पर मुकदमा चला और फैसला भी हो गया.

उसी दौरान बेनजीर भुट्टो को भी हिरासत में ले लिया गया. वर्ष 1977 से 1984 के बीच वो कई बार जेल गईं और रिहा हुईं. बाद में वो लंदन जाकर रहने लगीं. भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से बेनज़ीर ने वर्ष 1999 में पाकिस्तान छोड़ दिया. हालांकि, वर्ष 2007 में पाकिस्तान में एक चुनावी रैली में उनकी हत्या कर दी गई.

जनरल ज़ियाउल हक़ का विमान

वर्ष 1988 में जब जनरल ज़ियाउल हक़ का विमान बहावलपुर के रेगिस्तान में गिरा, तब से लेकर अब तक इससे जुड़े कई षड्यंत्रों पर काफ़ी चर्चा हुई है. बहुत से लोग अब भी मानते हैं कि जनरल ज़िया उल हक़ की मौत एक साधारण विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी, बल्कि साजिश का नतीजा थी.

वैसे पाकिस्तान में सेना के जनरलों द्वारा होने वाला तख्तापलट कोई नई बात नहीं है. यही वजह है कि वहां की जनता भी लोकतंत्र पर कम भरोसा करती है. वर्ष 2012 में हुई एक रिसर्च के मुताबिक पाकिस्तान में केवल 42 प्रतिशत लोग लोकतंत्र के पक्ष में थे.

पूरी दुनिया ये जानती है कि पाकिस्तान लोकतंत्र से नहीं चलता, बल्कि वहां की सेना जो चाहती है वो करती है. पाकिस्तान में सेना जिसे चाहती है, उसे प्रधानमंत्री बनाती है और जिसे चाहती है उसे रास्ते से हटा देती है. परवेज मुशर्रफ के साथ भी वही होगा जो पाकिस्तान की सेना चाहेगी.

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