पाकिस्तान की नई मुसीबत

डा. वेद प्रताप वैदिक

पाकिस्तान की सरकार ने कब्जाए हुए कश्मीर के एक उत्तरी हिस्से को, जिसे गिलगिट-बल्तिस्तान के नाम से जाना जाता है, अपना पांचवां प्रांत घोषित कर दिया है। 20 लाख की आबादी वाले इस शिया-सुन्नी क्षेत्र को पांचवां प्रांत घोषित करके पाकिस्तान ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। वह दोनों तरफ से मार खा रहा है। भारत सरकार तो उसका विरोध कर ही रही है, भारत के कश्मीरी अलगाववादी भी उस पर खुलकर हमला बोलेंगे।

भारत ने औपचारिक विरोध करते हुए कहा है कि पूरा का पूरा जम्मू कश्मीर भारत का है। उसके किसी भी हिस्से से छेड़छाड़ करना गैर-कानूनी है याने गिलगिट और बल्तिस्तान को नया प्रांत बनाना गैर-कानूनी है। भारत सरकार ने जो बात नहीं कही, और जो ज्यादा वजनदार है वह यह है कि संयुक्तराष्ट्र संघ के कश्मीर संबंध प्रस्ताव का भी यह उल्लंघन है।

इधर हमारे कश्मीर के अलगाववादियों का कहना है कि पाकिस्तान के ‘आजाद कश्मीर’ के हिस्सों को पाकिस्तान अपने अंदर मिला कर भारत के हाथ मजबूत कर रहा है, क्योंकि भारत ने कश्मीर पर जो कब्जा कर रखा है, उस कब्जे को यह पाकिस्तानी कब्जा जायज ठहरा देगा। हुर्रियत के नेताओं ने पिछले दो-तीन साल में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को कई विरोध-पत्र भी लिखे थे लेकिन उन्हें पाकिस्तान की मजबूरी का ठीक-ठीक अंदाज नहीं है।

पाकिस्तान ने इतना बड़ा कदम चीन के दबाव में ही उठाया हो सकता है। चीन का रेशम महापथ (ओबोर) इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है और यह क्षेत्र भयंकर उपद्रवों और दंगों से ग्रस्त रहता है। पाकिस्तान के ‘स्वायत्त क्षेत्र’ के नाते इसके नागरिकों के न तो कोई अधिकार हैं, न ही उन्हें न्यूनतम सुविधाएं प्राप्त हैं और न ही पाकिस्तान की सरकार में उनका उचित प्रतिनिधित्व है। उनके घावों पर मरहम रखने का नाटक किया जाएगा ताकि चीनियों के रास्ते में कोई अड़ंगा न लगे। डोनाल्ड ट्रंप के सख्त रवैये से राहत पाने के लिए चीन की खुशामद जरुरी है लेकिन इस कदम से पाकिस्तान का कश्मीरी जिहाद कमजोर पड़ सकता है।

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