ज्योतिष

पितृ दोष कारण निवारण

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री “श्री मां चिंतपूर्णी ज्योतिष संस्थान 5, महारानी बाग, नई दिल्ली -110014 8178677715

हमारे पूर्वज या पारिवारिक सदस्य जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितृ कहते हैं। पितृ हमारे व ईश्वर के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इनकी क्षमताएं व ताकत ईश्वरीय शक्ति जैसी होती है। पितृ मानव और ईश्वर के बीच एक योनि है जिसमें मरणोपरांत मनुष्य की आत्मा कुछ समय के लिए वास करती है।

पितृ दोष कैसे जन्म लेता है?

कहा जाता है कि जब भी व्यक्ति किसी दुर्घटना या बीमारी से अकारण मृत्यु को प्राप्त होता है या मृत्यु के समय यदि कोई इच्छा अधूरी रह जाती है तो जातक पितृ योनि को प्राप्त होता है और वह इस योनि में भटकता रहता है जब तक उसकी इच्छा पूर्ण नहीं कर दी जाती या इच्छा शांत नहीं कर दी जाती। वह अतृप्त आत्मा परिवार वालों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अनेक प्रकार से परेशान करना शुरू कर देती है। पितृ दोष निवारण के पश्चात् जब यह आत्मा शांत हो जाती है तो वह पुनर्जन्म ले लेती है या ईश्वर में लीन हो जाती है।

यदि पितृ आपके कर्मों से संतुष्ट व सुखी हैं तो आपको इसका विशेष लाभ भी मिलता है। आप जिस कार्य को शुरू करते हैं उसी में लाभ होता है। आपका शौर्य दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता है। रोग और कलह पास भी नहीं फटकते। ऐसा माना जाता है कि जिस परिवार में अधिकतर लोग सात्विक प्रवृत्ति वाले, धर्माचरण करने वाले व ईश्वर की नियमित रूप से प्रार्थना करने वाले होते हैं ऐसे सद्गुणी व संस्कारी लोगों के जीवन में अनहोनी घटनाएं जैसे अल्पमृत्यु, आदि की संभावनाएं कम रहती हैं तथा पितृदोष आदि नहीं होते। गुरु ग्रह हमारे पूर्वजों का कारक है। इसके अच्छा होने की स्थिति में हमें पिता, पितामह व उनके भी बुजूर्गों की अच्छी आत्माओं का स्नेह व शक्ति प्राप्त होती रहती है। यदि परिवार के अधिकतर सदस्यों के हाथ में गुरु पर्वत उभरा हुआ हो तो अधिकतर लोग सत्वगुणी होंगे तथा संतान सुख भी अच्छा रहेगा। ऐसे परिवारों में पितृ दोष नहीं होता तथा कुल की उन्नति निरंतर होती रहती है एवम् संतान खूब फलती फूलती है।

कुंडली में पितृ दोष

 लग्न में गुरु नीचराशिस्थ हो तथा उसपर पाप ग्रहों का प्रभाव रहने से पितृदोषहोता है।
 पंचम, नवम भाव में सूर्य या चंद्रमा के साथ राहु होने से पितृदोष होता है।
 पंचमेश या नवमेश नीचराशिस्थ हों या अशुभ भावों में हों अथवा राहु/केतु आदि
 से संयुक्त हों तो भी पितृदोष होता है।
 यदि राहु या केतु सूर्य के साथ दस अंशों से कम की दूरी पर स्थित हो तो पितृ
 दोष बढ़ जाता है और यदि राहु-केतु के नक्षत्र में सूर्य, चंद्र हों तो भी पितृ दोष
 और अधिक हो जाता है।
 लाल किताब के अनुसार यदि शुक्र, बुध अथवा राहु में से कोई एक, दो या तीनों
 ग्रह दूसरे, पांचवें, नवें या 12वें भाव में हों तो पितृदोष होता है।
 पितृ दोष लक्षण
 यदि परिवार में किसी बुजुर्ग के बाल सफेद होने के पश्चात् पीले होने लगें या
 काली खांसी हो जाए तो यह पितृ दोष के लक्षण हैं।
 माथे पर दुनिया की गंदी करतूतों का कलंक लग जाए तो यह पितृ दोष का लक्षण है।
 परिवार में अक्सर कलह रहती है।
 परिवार में कोई न कोई बीमारी बनी रहती है।
 परिवार में सदा आर्थिक तंगी रहती है और काम बनते-बनते बार-बार बिगड़ जाते हैं।
 संतान नहीं होती है या संतान मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर होती है।
 विवाह में अति विलम्ब होते हैं।पितृ पूजा के लिए आवश्यक निर्देश
 पितरों को मांस वाला भोजन न अर्पित करें।
 पूजा के दिन स्वयं भी मांस भक्षण न करें।
 पितृ पूजा में स्टील, लोहा, प्लास्टिक, शीशे के बर्तन का प्रयोग न करें। मिट्टी या
 घंटी न बजाएं।
 पितृ पूजा करने वाले व्यक्ति की पूजा में व्यवधान न डालें।
 बुजुर्गों का सम्मान करें।पितृ की पहचान
 श्रीमद् भगवद् गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें तो आपको कुछ दिनों में ही स्वप्नमें पितृ दर्शन होंगे।
 रात को सोने से पहले हाथ पैर धोकर अपने मन में अपने पितृ से प्रार्थना करें कि जो भीमेरे पितृ हैं वे मुझे दर्शन दें।
 यदि आपका कोई कार्य अटक रहा है तो अपने पितृ को याद कीजिए और उन्हें कहें कियदि आप हैं तो मेरा अमुक कार्य हो जाए। मैं आपके लिए शांति पाठ कराउंगा। आपकीऐसी प्रार्थना से कार्य सिद्धि हो जोने पर यह प्रमाणित हो जाएगा कि आपको पितृ शांतिकरवानी चाहिए।

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