ग्रह कुछ कहते है – जरा गौर से सुनिए

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव 8178677715, 9811598848

कुंडली का प्रथम भाव जिसे लग्न के नाम से जाना जाता है। वास्तव में वह जातक की शरीर है, प्राण शक्ति है। उस शरीर में चंद्र मन की गति बताता है, सूर्य जातक की शरीर की प्राण शक्ति की आत्मा है। चंद्र सुस्थिर हो तो जातक मन से निर्मल, निश्छल और संवेदनाओं से ओतप्रोत होता है।

इसी तरह जब सूर्य सुस्थिर हो तो जातक की आत्मा बली होती है। यह जातक को आत्मबल के साथ जीने की कला देता है। और चंद्र का अधिकार क्षेत्र ह्रदय पर होने के कारण भावनाओं से युक्त हो जीवन को आनंद के साथ जीने के लिए प्रेरित करता है। अनुभव में यह पाया गया है की जब चंद्र कुंडली में सुस्थिर हो और केंद्र में हो तो जातक का मन सामान्य से अधिक चंचल, भावुक और अनिश्चित रहता है।

मंगल ग्रह से जातक साहस, क्रोध, निर्भीकता और धैर्य की जांच की जाती है। आवेश और धैर्य दोनों एक दूसरे के विपरीत शक्तियां है। जहाँ धैर्य है वहां आवेश नहीं और जहाँ आवेश है वहां धैर्य हो ही नहीं सकता।

मंगल जोश, उत्साह, ऊर्जाशक्ति तो देता है साथ ही शीघ्रता में बल प्रयोग करने की प्रवृत्ति भी देता है, यही वजह है की धैर्य का अभाव पराक्रम के समय परेशानी की स्थिति में भी डाल देता है।

बुध को एक जीनियस बालक की संज्ञा दी जा सकती है। जिसमें भरपूर विनोद है, बुद्धि है, भोलेपन के साथ बोलने और लिखने की अद्भुत कला है। इसे यदि केतु का साथ मिल जाए तो फिर बात ही क्या, फिर इसकी बौद्धिक क्षमता में 20 गुणी शक्ति आ जाती है, पर यहाँ सोचने की बात है की केतु के साथ बुध यदि वक्री अवस्था में होने पर बुध की बुद्धि को बल प्राप्त होता है। उसकी वाक्शक्ति केतु से कहीं अधिक हो जाती है।

इसका स्वभाव पानी के समान होता है, जिस ग्रह के साथ स्थित हो उस के रंग में रंग जाता है। जैसे शुक्र के साथ बैठकर यदि वाणी भाव को देखे तो व्यक्ति हंसी-मजाक की कवितायें करने वाला हो सकता है, ऐसे जातक की वाणी में हास्य और मिठास दोनों का अंश एक साथ देखा जा सकता है।

अब यही बात करें हम पक्ष शक्ति की तो, जातक का जन्म शुक्ल पक्ष में होने पर कुंडली के नैसर्गिक शुभ ग्रह बल प्राप्त करते है, कृष्ण पक्ष में जन्म होने पर अशुभ ग्रहों को बल प्राप्त होता है। इस बल का आकलन शुक्ल पक्ष की तिथियों के अनुसार बढ़ता और कृष्ण पक्ष की तिथियों के साथ घटता जाता है।

जातक का जन्म दिन के प्रथम भाग में हो तो बुध ग्रह बली हो जाता है, दोपहर का जन्म सूर्य को बल देता है, सूर्यास्त में जन्म होने पर शनि ग्रह को शक्ति मिलती है, रात्रि के प्रारम्भ में जन्म होने पर चंद्र को बल, अर्धरात्रि में शुक्र को और सूर्योदय से ठीक पहले का जन्म होने पर मंगल ग्रह के बल में बढ़ोतरी होती है।

क्या आपने कभी विचार किया है की राशियों में कौन बलवान है, इसमें स्थिर राशि 2, 5, 8, 11 वीं राशि चर राशियां अर्थात 1, 4, 7 और 10 राशि की तुलना में अधिक बलवान है। और इन सभी राशियों में भी द्विस्वभाव राशियां 3,6,9, 12वीं राशियां सबसे अधिक बलवान होती है। ग्रहों में मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि उत्तरोत्तर वक्री अवस्था प्राप्त होने पर अधिक बली होते है। इन सभी ग्रहों में मंगल सिर्फ अकेला ऐसा ग्रह है जो मित्र ग्रह की अपेक्षा शत्रु के साथ होने पर अधिक बली, साहसिक हो जाता है।

राशियों में भी 3,7, 11 राशियां वायु तत्व राशियां है, इन राशियों में जन्म लेने वाले जातक अत्यधिक विचारशील होते है, बहुत सोच समझने के बाद ही कोई निर्णय लेते है। कभी कभी बेसिर पैर की फैकने वाले भी होते है। बातों को बढ़ा चढ़ाकर बोलने वाले होते है। हालांकि द्विस्वभाव राशियों का स्वामित्व बुध और गुरु ग्रह के पास होने के कारण 3,6,9,12 राशियों के जातक बुद्धि और ज्ञान की सागर होते है।

मिथुन राशि क्योंकि द्विस्वभाव राशि भी है और वायु तत्व राशि भी है, ऐसा जातक विषयों का विचार और विवेचन करने के बाद ही जीवन में आगे बढ़ता है। वायुतत्व राशियों में मंगल ग्रह हो तो ऐसे में जातक अपने विचारों को कार्यरूप देने का प्रयास भी करता है।

व्यक्तियों में परीक्षण और निरीक्षण करने की अंतर्दृष्टि स्वत: ही होती है। लग्न भाव में स्थिर राशि व्यक्ति को वैचारिक स्थिरता और धैर्य शक्ति देता है। 1,5,9 राशियां अग्नि तत्व राशियां है, इन राशियों में मंगल, सूर्य की स्थिति व्यक्ति को निर्भीक, उत्साही और पुरुषार्थी बनाती है। स्थिर राशियों में मंगल स्थित हो तो व्यक्ति अभिमानी, धैर्यवान और आत्मविश्वासी होता है।

वैसे तो शुक्र ग्रह षष्ठ और द्वादश भाव में होने पर होने पर व्यक्ति को जीवन में वस्त्र और सुविधाओं की कमी नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसे व्यक्ति के जीवन में किसी एक सुख की कमी सदैव रहती है। शनि दूसरे या आठवें भाव में हो तो आयु लम्बी देता है। जिस जातक की कुंडली में केतु पराक्रम भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति साहस और शौर्य से युक्त होता है।

राहु नवम या एकादश में अच्छा होता है। गुरु त्रिकोण भाव में वह भी लग्न भाव में हो तो व्यक्ति उत्तम व्यक्तित्व वाला, सहनशील, परिपक्य, व्यवहारिक, अनुभव् से सीखने वाला, ज्ञानी और विचारों के विवेचन की समझ रखने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति में दृढ़ता, स्नेह, विनम्रता, आदर, सत्यता और अभिलाषा की भावना अधिक रहती है। शुक्र एक सुसंस्कृत, कलाप्रिय और आनन्द कारक ग्रह है। यह प्रेम, सहानुभूति, विलासी तथा ऐश्वर्य कारक है। शरीर की अपेक्षा बुद्धि और कला द्वारा यश, मान और धन प्राप्त करता है।

शुक्र अपने कौशल, कला और रचनात्मकता के लिए जाना जाता है। बल से अधिक कला के बल पर यश और धन प्राप्त करता है। अब यहीं बात करें हम शनि की, शनि शुभ हो तो साक्षात शिव भगवान का प्रतीक है।

इस ग्रह की राशि लग्न में हों तो अंतर्मुखी अवश्य होते है, निष्ठा, ईमानदारी और मेहनत के साथ एक अच्छी प्रेरणा के साथ आगे बढ़ते है। ऐसे व्यक्तियों प्रत्येक कार्य को लगन से करते है। धर्म, ज्ञान, आध्यात्म की व्याख्या गूढ़ और दूरदृष्टि के साथ करते है। जीवन के प्रत्येक कार्य में गहराई होती है।

राहु ग्रह की गणना एक और जहाँ अशुभ ग्रहों में की जाती है, वहीँ राहु की आलोचना उसके मलिन विचारों के लिए भी की जाती है। राहु बली हो, लग्न में हो, तो व्यक्ति कई बार पाप कार्यों की और आकर्षित हो जाता है अर्थात ऐसे व्यक्ति गलत तरीकों से आगे बढ़ने का प्रयास करता है। सफलता और स्वार्थ के लिए गलत रास्तों का प्रयोग भी करता है।

इस ग्रह की दशा आने पर व्यक्ति के भटकने की संभावनाएं अधिक बनती है। परन्तु कई बार राहु सुस्थिर हो तो व्यक्ति सफलता की उच्चाईयाँ भी प्राप्त करता है। अनुभव में देखा गया है की राहु की दशा जीवन में उथल-पुथल तो मचा ही देती है।

एक और बात की राहु क़ानून और नियमों के विपरीत कार्य करना पसंद करता है, परम्पराओं से हटकर, लीक से हटकर, नैतिकता से परे, और साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग कर काम निकलवाना राहु से प्रभावित जातक को बेहतर तरीके से आता है। शीघ्र धन कमाने की सारे तरीके राहु को पसंद है, ऐसे में व्यक्ति गैर कानूनी तरीकों से भी धन अर्जित करने का प्रयास करता है।

यहां यह नहीं समझना चाहिए की राहु केवल अशुभ फल ही देता है। राहु व्यक्ति को आविष्कार करने, कुछ नया करने और कुरीतियों के विपरीत जाकर कार्य करने की योग्यता भी देता है। राहु से प्रभावित व्यक्ति संशोधन, बदलाव और नए विचारों का स्वागत करने वाले होते है।

राहु अशुभ हो तो व्यक्ति कई बार स्थान परिवर्तन और कार्यक्षेत्र में बदलाव की कोशिश करता है, कई बार ऐसे व्यक्ति को जॉब में उतार-चढ़ाव का सामना भी करना है। मन चिड़चिड़ा, हताश, क्रोधी, एकांकी और अन्तर्मुख हो जाता है।

व्यर्थ की भटकन और यात्राएं होती रहती है। कभी-कभी बहुत रोने को जी करेगा। मन में अपराध भावना जागृत होगी, जिससे किसी को मार देने या मर जाने की इच्छा भी होगी। शिक्षा काल में व्यवधान आयेगा। व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता है।

केतु चिन्ता, दुविधा, एकाग्रता का अभाव, एवं ध्यान इधर-उधर भटकाता है। पहले से हटकर काम में परिवर्तन आता है।

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