राष्ट्रीय

इस साल भारत के साथ संबंधों में तनाव के साथ ही नेपाल में रही राजनीतिक अस्थिरता

नेपाल ने सड़क के उद्घाटन का विरोध किया और दावा किया कि यह उसके क्षेत्र से होकर गुजरती है।

काठमांडू, 25 दिसंबर : वर्ष 2020 में सीमा विवाद के बाद भारत के साथ नेपाल के संबंधों में काफी तल्खी आ गई, लेकिन सिलसिलेवार उच्चस्तरीय वार्ताओं के चलते ये काफी हद तक पुन: पटरी पर आ गए। इसके साथ ही हिमालयी देश में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही और यह साल सत्तारूढ़ दल में सत्ता संघर्ष को लेकर देश को गंभीर राजनीतिक संकट में छोड़कर जा रहा है।

भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक और धार्मिक संबंधों में तब संकट शुरू हो गया जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस साल आठ मई को लिपुलेख दर्रे को उत्तराखंड में धारचूला से जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया।

नेपाल ने सड़क के उद्घाटन का विरोध किया और दावा किया कि यह उसके क्षेत्र से होकर गुजरती है। इसके कुछ दिन बाद नेपाल एक नया नक्शा लेकर आया जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाली क्षेत्रों के रूप में दिखाया गया। नेपाल के नक्शा जारी करने के बाद भारत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे ‘‘एकतरफा कदम’’ करार दिया तथा कहा कि क्षेत्रीय दावों का इस तरह का ‘‘कृत्रिम विस्तारण’’ स्वीकार्य नहीं है। भारत ने कहा कि नेपाल के कदम से दोनों देशों के बीच बनी इस समझ का उल्लंघन हुआ है कि सीमा मुद्दों का समाधान वार्ता के माध्यम से किया जाएगा।

द्विपक्षीय संबंधों में आए तनाव में साल के अंत में सिलसिलेवार उच्चस्तरीय यात्राओं के चलते कमी आई और संबंध काफी हद तक पटरी पर आ गए। इसके साथ ही कोविड-19 महामारी के प्रकोप के बीच भारत ने जोर देकर कहा कि वह खुद को हिमालयी देश के ‘‘सबसे बड़े मित्र’’ तथा विकास साझेदार के रूप में देखता है। विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला की नवंबर में हुई नेपाल की पहली यात्रा मुख्यत: द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने पर केंद्रित थी। श्रृंगला ने नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली और देश के अन्य शीर्ष नेताओं से मुलाकात की तथा दोनों देशों के बीच संबंधों के महत्व पर जोर दिया।

ओली ने भी द्विपक्षीय संबंधों में गति लाने तथा द्विपक्षीय वार्ता के स्तर को बढ़ाने की नेपाल की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इतिहास ने भारत और नेपाल को कुछ अनसुलझे मुद्दे दिए हैं जिनका वार्ता के जरिए समाधान किया जा सकता है। संबंधों में सुधार के लिए श्रृंगला की यात्रा से पहले थलसेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे तथा रॉ के प्रमुख सामंत कुमार गोयल ने काठमांडू के तूफानी दौरे किए।

दिसंबर के शुरू में वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पार्टी के विदेश मामले विभाग के प्रमुख विजय चौथाईवाले ने भी नेपाल का दौरा किया। उच्चस्तरीय दौरे ऐसे समय हुए जब सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में ओली और पूर्व प्रधानमंत्री एवं पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पुष्प कुमार दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व वाले दो गुटों में सत्ता साझेदारी समझौते को लेकर प्रतिद्वंद्विता के चलते आंतरिक कलह चरम पर थी।

संकटों में घिरे प्रधानमंत्री ओली ने इस साल के अंतिम दिनों में विवादास्पद कदम उठाते हुए राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से मुलाकात कर संसद को भंग करने तथा अप्रैल-मई में मध्यवाधि चुनाव कराने की घोषणा कर दी। विपक्ष और एनसीपी के असंतुष्टों ने ओली के इस कदम को ‘‘असंवैधानिक तथा मनमानी’’ करार दिया। चीन की तरफ झुकाव रखने के लिए जाने जाने वाले ओली ने दावा किया था कि सामरिक रूप से महत्वपूर्ण तीन भारतीय क्षेत्रों को नेपाल के राजनीतिक नक्शे में शामिल किए जाने के बाद उनकी सरकार को अपदस्थ करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

देश में राजनीतिक अस्थिरता के बीच विभिन्न जगहों पर राजतंत्र समर्थक रैलियां भी हुईं जिनमें संवैधानिक राजतंत्र को बहाल करने और देश को पुन: हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की मांग की गई। वर्ष 2006 में हुए आंदोलन के बाद नेपाल में 240 साल पुरानी राजतंत्र प्रणाली समाप्त हो गई थी और देश को 2008 में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया गया था। इस साल चीन भारी निवेश, कर्ज तथा वित्तीय मदद के बहाने नेपाल के साथ अपने संबंधों को और प्रगाढ़ करने की कोशिश करता दिखा।

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