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सावधान! तानाशाही मुहूर्त देखकर नहीं आती है

बड़ी बीमारियां अपने शुरुआती लक्षण जरूर दिखाती हैं अगर इन लक्षणों को पहचानकर सही समय पर इलाज शुरू नहीं किया गया तो बीमारियां आगे चलकर लाइलाज बन जाती हैं.

भारतीय लोकतंत्र के लिए यह समय कुछ ऐसा ही है. लक्षण इस बात के साफ-साफ संकेत दे रहे हैं कि आने वाले वक्त में तानाशाही प्रवृतियां इतनी मजबूत हो जाएंगी कि जनता के लिए मुंह तक खोलना दूभर होगा.

इस चिंता का आधार वह धारणा नहीं है, जो नरेंद्र मोदी के जरूरत से ज्यादा मजबूत नेता होने और विरोधी आवाजों के व्यवस्थित दमन को लेकर बनी हैं.

केंद्र सरकार को थोड़ी देर के लिए भूल जाएं और राज्य सरकारों के कुछ फैसलों पर गौर करें तो पता चलेगा कि डिक्टेटरशिप इस देश में हर स्तर पर किस तरह सिर उठा रहा है।

राजस्थान में महारानी लाईं कानून का हंटर

राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार अपने अजीबोगरीब फैसलों के लिए लगातार सुर्खियों में रही है. ताजा मामला एक ऐसे कानून का है,जो लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता पैदा करता है.

सरकार पहले ही एक ऐसा अध्यादेश कर चुकी है, जिसके तहत अब बिना सरकारी अनुमति के किसी भी लोकसेवक के खिलाफ ना तो पुलिस एफआईआर दर्ज करेगी और ना ही मीडिया उनसे जुड़े आरोपो पर खबरें बना पाएगा. अब विधानसभा से मंजूरी के लिए इसी कानून से जुड़ा बिल पेश किया जा रहा है.

भारतीय लोकतंत्र चेक एंड बैलेंस पर आधारित है. यानी लोकतंत्र के खंभे हमेशा एक-दूसरे को नियंत्रित करते हैं. सरकार निरंकुश न हो जाए यह देखना संसद और विधानसभाओं का काम हैं, जिन्हें हम विधायिका कहते हैं.

कार्यपालिका और विधायिका संविधान के मुताबिक काम करें यह सुनिश्चित करना न्यायपालिका का काम है. सरकार की सारी इकाइयों के कामकाज की रिपोर्टिंग करना और खबरें जनता तक पहुंचाना मीडिया की जिम्मेदारी है, इसलिए उसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है.

लेकिन वसुंधरा राजे सरकार के कानून पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि इसके जरिए सारी ताकत हड़पने की कोशिश की गई है. अगर सरकार की नीयत साफ होती तो अध्यादेश की जगह विधानसभा सत्र में सीधे विधेयक लाती, उसकी खूबियों और खामियों पर चर्चा करवाती और फिर उसे पास करवाकर कानून बनवाती.

आखिर आनन-फानन में अध्यादेश जारी करवाने की जल्दी क्यों थी? खबर यह भी है कि राज्य के विधि विभाग ने इस कानून को लेकर बहुत सारे सवाल उठाए थे, लेकिन उनकी अनदेखी कर दी गई.

अध्यादेश में यह कहा गया है कि किसी सरकारी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए संबंद्ध प्राधिकरण से लिखित मंजूरी लेनी होगी और अनुमति देने या न देने का फैसला करने के लिए सरकार के पास छह महीने का वक्त होगा.

इस दौरान आरोपित व्यक्ति का नाम उजागर नहीं किया जाएगा. यह बात अपने आप में बहुत ही विचित्र है. जिस पर आरोप है, उसी के मुखिया को भला कैसे जज बनाया सकता है?

अध्यादेश में यह भी कहा गया है कि जब तक सरकार अनुमति नहीं देती तो न्यायालय भी ऐसे किसी आरोप का संज्ञान नहीं लेगा और मीडिया उसकी खबरें प्रसारित नहीं करेगा.

आरटीआई के जरिए भ्रष्टाचार की न जाने कितनी घटनाएं उजागर होती हैं. लेकिन अब ऐसी खबरें प्रसारित करना गैर-कानूनी होगा और गुनहगार को दो साल तक की सजा हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करवाने को एक मूलभूत नागरिक अधिकार करार दिया था. लेकिन राजस्थान सरकार का यह कानून सीधे-सीधे इस मूलभूत नागरिक अधिकार का हनन करता है.

बहुत संभव है कि वसुंधरा राजे सरकार के इस कदम को अदालत में चुनौती मिले. लेकिन फिलहाल स्थिति यही है कि राजस्थान सरकार ने निरंकुशता की तरफ एक और कदम बढ़ा दिया है.

यूपी में नेता मालिक और कर्मचारी नौकर

बीजेपी शासित बाकी राज्यों का भी यही हाल है. यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार के ताजा फरमान में कहा गया है कि जब कोई जन-प्रतिनिधि किसी सरकारी दफ्तर में जाए तो अधिकारी और कर्मचारी उसके सम्मान में कुर्सी छोड़कर खड़े हो जाएं. सवाल यह है कि योगी सरकार को ऐसा फरमान सुनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

 

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