छत्तीसगढ़

अंत समय भावों में साधुता अवश्य आए ऐसी प्रार्थना करें : साध्वी रत्ननिधि

रायपुर : ऋषभदेव जैन मंदिर सदरबाजार में चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में निपुणाश्री की विदुषी शिष्या प्रवचन प्रवीणा स्नेहयशाश्री की अंतेवासिनी साध्वी रत्ननिधिश्री ने नवपद ओली की आराधना के पंचम दिवस श्रद्धालुओं को साधु पद की महिमा से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि, 27 गुणों से विभूषित साधु भगवंत की आराधना हमें 27 लोगस्स, 27 खमासणे, 27 स्वस्तिक की रचना कर `उं ह्रीं णमो साहूणं` की 20 माला फेरते हुए करनी चाहिए। साधु भगवंत जिनका पंच परमेष्ठी में अंतिम स्थान है किंतु सभी पदों में उनकी महिमा, गरिमा महान है। अरिहंत बनने से पूर्व साधु बनना होता है। सिद्ध, आचार्य और उपाध्याय भी साधु बने बिना प्राप्त नहीं हो सकते। कैवल्य ज्ञान सहित अन्य ज्ञान भी साधू बने बिना प्राप्त नहीं किए जा सकते, सिद्ध पद को प्राप्त नहीं किया जा सकता। मरुदेवी माता ने भी तभी सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जब उनके भावों में साधुता आई। पंच परमेष्ठी के चार पदों में से कोई भी पद बिना साधु बने मिल नहीं सकता। भगवान महावीर स्वामी को जब कैवल्य ज्ञान हुआ और समवशरण की रचना हुई, चतुर्विध संघ की स्थापना हुई किंतु उनकी प्रथम देशणा खाली गई, क्योंकि समवशरण में आए देवगणों में से कोई भी साधु पद को प्राप्त नहीं था। जिन शासन तक चलेगा जब तक साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविकाएं होंगे। नवपद की ओली करने वाले श्रावक-श्राविकाएं भाग्यशाली हैं, वे `णमो लोए सव्व साहूणं` की एक माला अवश्य करनी चाहिए। बिना श्रद्धा व समर्पण के कोई भी कार्य फलीभूत नहीं हो पाता। हमें श्रीपाल व मैनासुंदरी की तरह नवपद ओली की आराधना करते हुए साधु जीवन को पाने की मंगल कामना करते हुए यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे परमात्मा अंत समय में मेरे भावों में साधुता अवश्य आ जाए ताकि मुझे सद्गति प्राप्त हो।

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