EXCLUSIVE :कृषि विश्वविद्यालय में प्रमोशन,वेतन निर्धारण में करोड़ों का गड़बड़झाला

राज्यपाल से शिकायत,शिकायतकर्ता को चुप रहने की हिदायत

रायपुर:प्रदेश के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में घोटाला नहीं बल्कि 500 -600 मिलियन के महाघोटालें का मामला प्रशासन के उदासीनता की भेंट चढ़ता जा रहा है।कृषि विश्वविद्यालय में प्राध्यापकों और वैज्ञानिकों के प्रमोशन तथा वेतन निर्धारण में करोड़ों के भ्रष्टाचार का गड़बड़झाला नियमों को ताक पर रख कर कर दिया गया।इस पूरे मामले की शिकायत राज्यपाल से की गई है।

इधर मामले की शिकायत के बाद शिकायतकर्ता को विश्वविद्यालय से अनावश्यक पत्राचार ना करने की हिदायत दी गई है।क्लिपर 28 को मिली शिकायत और दस्तावेज के आधार पर टीम ने जांच -पड़ताल शुरू की।टीम ने विश्विद्यालय के अधिकारियों से चर्चा कर उनका पक्ष भी जाना।विवि के एक अधिकारी ने क्लिपर 28 को इस महाघोटाले और गड़बड़ी होने की पुष्टि भी की।

ये है पूरा मामला,पढ़ें विस्तार से

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में घोटाले का अंबार है।विवि में प्रमोशन तथा वेतन निर्धारण में मनमाने और नियम विरुद्ध तरीके से बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार कर सरकार के खजाने को करोड़ो का चूना लगाया गया है।विवि के नाक के नीचे इस गोरखधंधे का खेल चल रहा है।शिकायतकर्ता की ओर से राज्यपाल को सौंपे गए पत्र में बताया गया है कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में हुए इस महाघोटाले की उचित जांच के लिए बारम्बार विश्विद्यालय प्रशासन से शिकायत की गई, लेकिन बावजूद इसके कोई कार्यवाही नहीं की गई।

विवि में करीब 500-600 मिलियन के महाघोटाले के चलते वैज्ञानिकों की वरिष्ठता सूची भी प्रकाशित नहीं हो पा रही है, जबकि विश्वविद्यालय अन्य सभी वर्ग के कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची हर वर्ष प्रकाशित कर विवि की वेबसाइट पर अपडेट करता है। विवि में जानबूझकर तथा नियमों की गलत व्याख्या कर अपने खास लोगों को गलत ढंग से फायदा पहुंचाया जा रहा है। इस महाघोटाले के चलते बहुत से कनिष्ठ अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों से भी ज्यादा वेतन पा रहे हैं। कुछ वैज्ञानिक जैसे कि डॉ. देवेश पांडेय, तो कुलपति से भी ज्यादा वेतन प्राप्त कर रहे हैं।

शिकायतकर्ता ने पत्र में बताया कि विश्वविद्यालय के नियमों के तहत पांचवें एवं छटवें वेतनमान में वैज्ञानिक से वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर प्रमोशन हेतु पीएचडी की डिग्री अनिवार्य है ,लेकिन डॉ .पी .के तिवारी को बिना पीएचडी के डिग्री के ही वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद प्रमोशन दे दिया गया ।फर्जी तरीके से मिले इस प्रमोशन को विश्विद्यालय ने कार्यवाही करते हुए वापस भी ले लिया था। लेकिन विवि के इस आदेश की धज्जियां उड़ाकर डॉ. पी. के. तिवारी ने पुनः प्रमोशन ले लिया।

शिकायतकर्ता ने बताया कि भ्रष्टाचार के तहत प्रमोशन देकर डॉ पी.के. तिवारी को 37400 -67000 के वेतनमान के साथ 9000 का AGP भी जनवरी 01, 2006 को ही दे दिया गया ,जबकि वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर 3 वर्ष के बाद ही यह वेतनमान मिलता है।छटवें वेतनमान में बिना कोर्स के पीएचडी को मानयता नहीं है ,फिर भी उसे मान्य करते हुए डॉ. पी. के तिवारी को प्रधान वैज्ञानिक के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। विश्विद्यालय की धारा 05 के तहत प्रमोशन हेतु सेलेक्शन कमेटी का गठन किया जाता है, लेकिन डॉ. पी. के. तिवारी को बिना सेलेक्शन कमेटी के गठन के ही प्रमोशन दे दिया गया।

छटवें वेतनमान में कोर्स पीएचडी के एवज में 03 अग्रिम वेतन वृद्धि की पात्रता दी गई है, लेकिन डॉ.पी. के. तिवारी को बिना कोर्स पीएचडी के ही तीन अग्रिम वेतन वृद्धि दे दी गई।

शिकायतकर्ता ने पत्र में बताया कि विवि में ऐसे एक नहीं बल्कि कई भ्रष्टाचार के प्रकरण हैं। जिसमें नियम विरुद्ध और मनमानी ढंग से भ्रष्टाचार और गड़बड़झाला कर सरकार के राजस्व को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

कुलपति ने पक्ष देने से किया इंकार

क्लिपर 28 की टीम ने जब इस महाघोटाले के संदर्भ में कुलपति डॉ. एस. के. पाटिल से उनका पक्ष जानना चाहा, तो कुलपति ने टीम को अपना पक्ष देने से इंकार कर दिया।कुलपति ने विवि के जनसंपर्क अधिकारी से जानकारी लेने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया।यहां ये बताना इसलिए जरूरी है क्योंकि आज से करीब 2 साल पूर्व इस घोटाले के संबंध में एक समाचार पत्र को दिए अपने साक्षात्कार में कुलपति जी ने मामले की जांच समिति से जांच कराने की बात कही थी।लेकिन साल बीतते गए ना जांच हुई और नाहीं कोई कार्यवाही।ऐसे में भ्रष्टाचारियों के हौसले और बुलंद होना लाजिमी है।

अनुसंधान सहा. संचालक ने माना कि गड़बड़ी और घोटाला हुआ है

विवि में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोटाले के संबंध में जब टीम ने अनुसंधान सहा. संचालक व्ही. के. त्रिपाठी से उनका पक्ष जाना, तो उन्होंने क्लिपर 28 को पहले तो कई नियम गिनाए, लेकिन जब घोटाले पर सवाल आगे बढ़ते गए तो उन्होंने माना कि विवि में नियम विरुद्ध तरीके से प्रमोशन तथा वेतन निर्धारण में भ्रष्टाचार हुआ है।

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