राहुल बाबा से झप्पी वाला बाबा

श्याम वेताल
      श्याम वेताल

संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास जाकर झप्पी लेना इतना प्रचारित हुआ उनका भाषण शून्य में चला गया. राहुल की इस झप्पी के साथ उनकी आंखों की बदमाशियां भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई. इतना ही नहीं, राजनीति के मैदान में राहुल के इस अभिनव प्रयोग की न केवल खिल्ली उड़ायी गयी बल्कि तरह-तरह के जोक भी बने.

यह बात समझ से परे है कि राहुल ऐसा बरताव क्यों करते हैं कि उनका मजाक बने. क्या वह मीडिया में छाने के लिए ऐसा करते हैं या वह नयी राजनीति का कोई पैमाना बनाने के लिए ऐसी हरकतें करते हैं? जो भी हो, उनका पासा सीधा नहीं पड़ रहा है. हालांकि, कांग्रेस पार्टी के लोग राहुल के पक्ष में सफाई देते हुए कहते हैं कि हमारे नेता की भलमनसाहत भाजपाइयों को पच नहीं रही है. उन्हें लगता है कि इससे राहुल गांधी को पॉलिटिकल माइलेज मिल जाएगा इसलिए उसे बेअसर करने के लिए उनकी खिल्ली उड़ाना शुरू कर देते हैं.

हो सकता है राहुल गांधी वास्तव में नयी राजनीति का बीज बो रहे हों और उसी के तहत नये-नये प्रयोग कर रहे हों. लेकिन, राजनीति में नया प्रयोग उस समय तक सफल नहीं होने दिया जाता जब तक प्रयोगकर्ता स्वयं सफलता की शिखर पर न पहुंचा हो और सफलता की चोटी पर पहुंचने के लिए परंपरागत राजनीति के रास्ते से होकर ही आगे बढ़ना पड़ता है.

बहरहाल, झप्पी कांड का अध्याय अभी शायद पूरा नहीं हुआ है. राहुल गांधी ने ही कहना शुरू कर दिया है कि अब तो भाजपा के लोग मुझे सामने से आता देखकर दाएं-बाएं हो जाते हैं कि कहीं मैं उनकी झप्पी न ले लूँ. राहुल की बातों और बयानों से बात बनने के बजाय बिगड़ने की ही आशंका है. इसके अलावा, इस बात का भी डर है कि लोग राहुल बाबा को अब झप्पी वाला बाबा न कहने लगें.

जहां तक राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस के आगे बढ़ने का प्रश्न है उसकी स्पीड बहुत धीमी दिखाई देती है और रास्ते में स्पीड ब्रेकर भी बेशुमार हैं. इन स्पीड ब्रेकरों में कुछ तो कांग्रेस के ही लोग हैं जो राहुल गांधी के आसपास होते हैं और उन्हें उल्टी-सीधी एडवाइज देते रहते हैं. यह झप्पी लेने वाली सलाह भी ऐसे ही किसी करीबी ने दी होगी. ये ठीक है कि किसी भी नेता को ‘अपनो’ की सलाह पर चलना चाहिए लेकिन हर सलाह को अपने विवेक की तराजू पर तौल लेना चाहिए और उसके गुण-दोषों पर भली-भांति विचार कर लेना चाहिए. पॉलिटिक्स में नये-नये ट्रेण्ड लाने के सलाहकारों के सुझाव हमेशा ठीक हो, यह जरूरी नहीं है. राजनीति में परंपराओं को तोड़कर आगे बढ़ने का रास्ता सुगम नहीं होता. वैसे भी, भारत की तीन चौथाई जनता आज भी अपनी परंपराओं पर ही विश्वास करती है. संसद के अंदर प्रधानमंत्री की झप्पी या उसके बाद आंख मारने की राहुल की हरकत को देश की जनता ने सकारात्मक राजनीति नहीं माना है. राहुल को ऐसी हरकतों से बचने की कोशिश करनी होगी.

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