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ड्रोनों के विकास में देरी पर उठा सवाल, हवाई निगरानी क्षमता प्रभावित

नई दिल्ली: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने देश के प्रमुख रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा चालक रहित विमानों (ड्रोन) के विकास में देरी पर सवाल उठाते हुए कहा है कि 1000 करोड रुपए से अधिक की राशि खर्च होने के बावजूद सेना को ड्रोन नहीं मिलने से उसकी हवाई निगरानी क्षमता प्रभावित हुई है। कैग ने संसद में पेश रिपोर्ट में कहा है कि सेना की हवाई निगरानी क्षमता बढाने के लिए डीआरडीओ को ड्रोन विकसित करने को कहा गया था।

इन ड्रोनों को मार्च 1995 तक बनाया जाना था लेकिन काम पूरा नहीं होने के कारण इसकी समय सीमा पांच बार बढाई गई। आखिरकार 2002 में ड्रोन के परीक्षण किए गए जो सफल नहीं रहे। इसके बाद जुलाई 2003 में इनका दोबारा परीक्षण किया गया और उस समय अधिकतम गति, सहनशक्ति और लक्ष्य संबंधी कुछ तकनीकी मानकों में रियायत दी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्टूबर 2005 में 234 करोड रुपए की लागत से 12 ड्रोन की आपूर्ति का आर्डर दिया गया। सेना को 2013 में चार ड्रोन की आपूर्ति की गई लेकिन ये चारों तीन वर्षों के अंतराल में दुर्घटनाग्रस्त हो गए।

इसके अलावा फरवरी 2011 में डीआरडीओ को 1540 करोड रुपए की लागत से तीनों सेनाओं के लिए 76 ड्रोन विकसित करने को कहा गया। यह परियोजना भी अपने निर्धारित समय अगस्त 2016 में पूरी नहीं हुई। मई 2016 तक इसके लिए 1017 करोड रुपए की राशि का भुगतान किया गया। अब इस परियोजना के 2019 में पूरा होने की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस परियोजना के समय पर पूरा नहीं होने के कारण एक हजार करोड रुपए से ज्यादा राशि खर्च होने के बावजूद सेना को ड्रोन नहीं मिले और उसकी हवाई निगरानी क्षमता प्रभावित हुई है।

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