जजों की रिटायरमेंट की आयु बढ़ाना अदालतों में लंबित मामलों को कम करने का एक तरीका: आरसी लाहोटी

एक किताब के ऑनलाइन विमोचन समारोह में पैनल चर्चा के दौरान टिप्पणी की गई

नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस आरवी रवींद्रन की एक किताब के ऑनलाइन विमोचन समारोह में पैनल चर्चा के दौरान रिटायर्ड चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) आरसी लाहोटी ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जजों की रिटायरमेंट की आयु बढ़ाना अदालतों में लंबित मामलों को कम करने का एक तरीका है.

इस पैनल का संचालन कर रहे वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने भारतीय अदालतों में 50 लाख से अधिक लंबित मामलों और मामलों के निपटान में देरी की समस्या पर सवाल उठाया.

इस पर पूर्व CJI आरसी लाहोटी ने कहा, “रिटायरमेंट की आयु बढ़ाई जानी चाहिए, ये सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के लिए समान होनी चाहिए.” उन्होंने यह भी कहा कि “यदि रिटायरमेंट की आयु समान हो जाएगी तो चूहा दौड़ भी बंद हो जाएगी और हाई कोर्ट के जज के कार्यालय की गरिमा, जो दिन-ब-दिन क्षीण होती जा रही है, को बहाल किया जा सकेगा.”

पूर्व CJI लाहोटी ने यह भी तर्क दिया कि रिटायरमेंट की आयु में वृद्धि से देश को अनुभव का लाभ मिलेगा. उन्होंने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के लिए रिटायरमेंट की आयु समान हो जाती है, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि (हाई कोर्ट) मुख्य न्यायाधीश दिल्ली का चक्कर लगाना बंद कर देंगे.

वहीं पूर्व CJI एमएन वेंकटचलैया, जिन्हें अन्य पैनलिस्टों द्वारा “न्यायपालिका के भीष्म पितामह” के रूप में सम्मानित किया गया था, ने भी सुझाव दिया कि रिटायरमेंट की आयु 68 वर्ष की जानी चाहिए. “वेंकटचलैया ने कहा कि हमने 1993 में सभी मुख्य न्यायाधीशों की पहली बैठक में यह सुझाव दिया था.”

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