धर्म नगरी फिंगेश्वर में आज मनाया जायेगा राज शाही दशहरा महोत्सव

बस्तर दशहरा के बाद फिंगेश्वर में दूसरे नम्बर का राजशाही दशहरा

गरियाबंद: विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के बाद छत्तीसगढ़ में ख्याति प्राप्त धर्म नगरी फिंगेश्वर का शाही दशहरा विजयादशमी के बाद मनाया जाता है। तय कार्यक्रम के अनुसार दशहरा महोत्सव के शुभारंभ पर सुबह बालाजी, पंच मंदिर, मौलीमाता मंदिर व फनीकेश्वरनाथ महादेव मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की जाएगी।

इस दशहरे को लेकर खास बात यह है बस्तर दशहरा के बाद दूसरे नम्बर का राजशाही दशहरा फिंगेश्वर में आयोजित होता है। जिसे देखने अलग अलग प्रदेश भर से हजारांे लोग आते हंै। राजशाही दशहरे की तैयारी को लेकर नगर के मंदिर ट्रस्टी समिती व नगर के वरिष्ठ नागरिकों और प्रशासन के बीच विशेष बैठक के बाद अब पूरी तैयारियां पूरी हो चुकी है।

रात में यहां विभिन्न कार्यक्रम सांस्कृतिक आयोजित किया जाता है। इस बार कार्यक्रम जल्द शुरू होगा और रात 10 बजे बंद हो जाएगा। साथ ही व्यवस्था संभालने बड़ी तदात में पुलिस बल भी मजूद रहेंगें।

शारदीय नवरात्रि से प्रारंभ राजशाही दशहरा को मनाने की तैयारी

राजशाही दशहरा को मनाने की तैयारी शारदीय नवरात्रि से प्रारंभ हो जाता है इस दिन माँ मावली देवी मंदिर के ज्योति कलस, घट स्थापना व जंवारा रोपण, पंचमी महाश्रृंगार मौली माता का किया जाता है, महाअष्टमी के दिन अष्टमी हवन मौली माता मंदिर प्रांगण में होता है उसके बाद महानवमी जंवारा विसर्जन होने के बाद तेरस को यानी दशहरे के तीन दिन बाद फिंगेश्वर राजशाही दशहरा महोत्सव आयोजन किया जाता है।

इस दिन सुबह से राज परिवार द्वारा इष्ट देवी देवताओं की पूजा अर्चना, मौली माता, बालाजी मंदिर श्री पंचदेव, फणिकेश्वरनाथ मंदिर में विशेष पूजा अर्चना व ध्वजारोहण किया जाता है, ठीक रात्रि में भगवान श्री रामचंद्र जी एवं सांग देवी की शोभा व विजय यात्रा निकाली जाती है जिसमे प्रमुख रूप से राजा महेंद्र बहादुर सिंह व युवराज निलेन्द्र बहादुर व राज परिवार विजय यात्रा में उपस्थित रहते है, जिसके बाद महल में राजा महेंद्र बहादुर सिंह पूरे रीति रिवाज और राज परिवार की परंपरा अनुसार पान सुपारी भेंट करने के बाद इन राजशाही दशहरा मोहत्सव का समापन होता है।

’नही होता फिंगेश्वर दशहरा में रावण दहन’

आपको बता दे कि जिस तरह से दशहरा उत्सव के दिन रावण दहन कर विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है लेकिन फिंगेश्वर के राजशाही दशहरा में रावण दहन नही होता,वैसे बड़े बुजुर्ग कहते है कि प्रतीकात्मक रावण को सिर्फ जला देने से समाज की बुराई खत्म नहीं होती, बल्कि समाज मे विद्यमान बुराइयों को समाज से खत्म करने से बुराई रूपी रावण को जलाने से ही समाज का नैतिक विकास संभव है, इसलिए यह सीख दिया जाता है कि खुद के अंदर छुपी बुराइयों के अंत करने से समाज मे बुराई रूपी रावण का अंत हो सकता है..!

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