कश्मीर में खुले बातचीत के दरवाज़े: बात निकलेगी तो दिल तलक जाएगी…

पीएम मोदी ने आज़ादी पर लाल किले से कश्मीर के मुद्दे पर कहा था कि कश्मीर समस्या का समाधान न गाली से और न गोली से होगा. कश्मीर समस्या का समाधान लोगों को गले लगाकर होगा. घाटी में घमासान के बाद अब मरहम की शुरुआत हुई है.

केंद्र सरकार ने बातचीत के दरवाज़े खोल दिए हैं. केंद्र सरकार कश्मीर में समाज के विभिन्न वर्गों से बातचीत की प्रक्रिया शुरू कर रही है.

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 1976 के आईपीएस अधिकारी दिनेश्वर शर्मा को जम्मू-कश्मीर में वार्ताकार नियुक्त किया है.

राजनाथ सिंह ने कहा है कि दिनेश्वर शर्मा को वार्ता के लिए पूरी आज़ादी होगी और वो जम्मू कश्मीर में बातचीत के लिए विभिन्न पक्षों को खुद तय करेंगे.

गृहमंत्री राजनाथ सिंह का ये ऐलान घाटी के घावों पर मरहम लगाने की कोशिश है. इससे पहले जब राजनाथ सिंह कश्मीर आए थे तब उस वक्त भी उन्होंने कहा था कि वह खुले मन से कश्मीर आए हैं और सभी पक्षों से बात करना चाहते हैं.

वो कश्मीरियों को मुस्कुराता हुआ देखना चाहते हैं और इसके लिए अगर उन्हें 50 बार भी कश्मीर आना पड़ा तो वो जरूर आएंगे.

घाटी में हिंसा भड़कने के बाद से राजनाथ ने कम से कम पांच बार कश्मीर का दौरा किया था. राजनाथ ने कई मौकों पर कहा कि मोदी सरकार कश्मीर मसले का स्थायी समाधान ढूंढ रही है.

इस बार उन्होंने बातचीत का दरवाज़ा खोल दिया और दिनेश्वर शर्मा को वार्ता की टेबल का अधिकार दे दिया है.

क्या उदारवादी अलगाववादियों के लिए खुलेगा दरवाज़ा?

दिनेश्वर शर्मा के लिए ये बड़ी जिम्मेदारी है. दिनेश्वर शर्मा घाटी के राजनीतिक दलों और समाज के दूसरे वर्गों के प्रतिनिधियों से बातचीत करेंगे. वो घाटी के युवाओं की अपेक्षाओं को समझने की कोशिश करेंगे. साथ ही तमाम पक्षों से हुई बातचीत को केंद्र और राज्य सरकार के साथ साझा करेंगे.

बड़ा सवाल ये है कि बातचीत के खुलते नए दरवाज़ों के भीतर क्या उदारवादी अलगावावदियों को आने की इजाज़त होगी? हालांकि केंद्र सरकार ने दिनेश्वर शर्मा को काम करने की पूरी आज़ादी दी है.

साथ ही उन्हें ये भी अधिकार दिया है कि वो जिससे भी चाहें उस वर्ग या दल से बातचीत करने के लिए स्वतंत्र हैं. ऐसे में उदारवादी अलगावादियों से बातचीत की संभावना बढ़ जाती है.

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दिनेश्वर शर्मा को घाटी में लोगों का दिल टटोलने की जिम्मेदारी दी है. इसकी दो बड़ी वजहें मानी जा सकती हैं. पहली ये कि दिनेश्वर शर्मा मणिपुर में भी अलगाववादी गुटों से बातचीत कर रहे हैं.

उनका अनुभव जम्मू-कश्मीर के हालातों को समझने के काम आ सकेगा. वहीं दूसरी तरफ दिनेश्वर शर्मा पूर्व में आईबी चीफ रह चुके हैं. दिनेश्वर शर्मा को जम्मू-कश्मीर इंटेलिजेंस का भी अनुभव है.

बतौर आईबी चीफ दिनेश्वर शर्मा घाटी के अंदरूनी हालातों और नुमाइंदों की सोच से भी वाकिफ हैं. रणनीतिक जानकार इसे एनएसए अजित डोवाल का मास्टरस्ट्रोक भी मान सकते हैं. लेकिन सियासी समाधान के तौर पर देखा जाए तो घाटी में ऐसे कदम की जरूरत थी जिसमें नरमी भी दिखे और भावनात्मक अपील भी हो.

क्योंकि इससे पहले तक कश्मीर समस्या के समाधान को लेकर केंद्र की तरफ से केवल सख्त रूख ही सामने था. जहां एक तरफ एनआईए ने टेरर फंडिंग पर शिकंजा कसकर कई अलगाववादियों को जेल भेज दिया था तो दूसरी तरफ घाटी में पत्थरबाज़ी बनाम पेलेट गन की जंग का शोर था.

वहीं हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए. हालात से निपटने के लिए की गई कार्रवाई के दौरान आम कश्मीरियों और सरकार के बीच भरोसा कम हुआ और गलतफहमियां बढ़ती गईं. केंद्र सरकार की तरफ से भी बातचीत की औपचारिक कोशिश नहीं की गई.

सरकार कश्मीरियों को गले लगाने को तैयार

वहीं दूसरी तरफ कश्मीर के हालात पर राजनीतिक बयानबाजी आग में घी का काम करती रही. कश्मीर को भारत में पूरी तरह शामिल करने के लिए संविधान में संशोधन करने तक की मांग उठी तो बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने केंद्र सरकार पर कश्मीर नीति को लेकर गंभीर आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि भारत ने कश्मीर को भावनात्मक तौर पर खो दिया है.

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