धार्मिक आस्था एवं परम्पराएं सम्माननीय : रिजवी

रायपुर ।

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के मीडिया प्रमुख एवं वरिष्ठ अधिवक्ता इकबाल अहमद रिजवी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यो की संविधान पीठ के सबरी माला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को हटाने का अधिकांशता: स्वागत किया जा रहा है, परन्तु समाज के ही कुछ लोग फैसले से नाखुश है, तथा सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका लगाने के लिये मुखर हो रहे है।

संविधान पीठ की एकमात्र महिला न्यायमूर्ति इन्दू मल्होत्रा ने इस फैसले से कुछ हद तक असहमति व्यक्त की है। उनके तर्क से स्पष्ट है कि धार्मिक आस्थाओं से जुडे़ विषयों के साथ छेड़छाड नही किया जाना चाहिये तथा उन्होने यह भी कहा कि यह तय करना अदालत का काम नही है कि कौन सी धार्मिक परम्पराएं खत्म की जायें।

इससे पूजा एवं इबादत करने के अधिकार के साथ टकराव की स्थिति निर्मित हो रही है। यह मसला केवल शबरी माला मंदिर प्रकरण तक ही सीमित नही है। इसका अन्य धर्मो के आराधनालयो की आस्था एवं परम्पराओ पर भी दूरगामी प्रभाव होगा।

रिजवी ने कहा है कि गत दिवस सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद को इस्लाम धर्म का अंग नही माना है। इस निर्णय पर भी न्यायमूर्ति इन्दू मल्होत्रा के उपरोक्त संबंधित विचार एवं तर्क को देखा जाना चाहिये। आम चर्चा है कि मस्जिद पर फैसला मुसलमानो की धार्मिक भावनाओ को आहत करने वाला है। न्यायमूर्ति इन्दू मल्होत्रा का निष्कर्ष सबरी माला मंदिर पर दिया गये असहमत विचार मस्जिद सहित अन्य धर्मावलम्बियो के आराधनालयो की धार्मिक आस्था एवं परम्परा के संदर्भ में भी माना जायेगा। सभी धर्मो के आराधनालय उस धर्म के अभिन्न अंग माने जाते है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए उन्होने कहा है कि मस्जिद इस्लाम का अंग है या नही इस नाजुक एवं संवेदलशील मुद्दे पर केन्द्र की सरकार या सुप्रीम कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर संविधान पीठ में इस मसले को भेजना उपयुक्त होगा क्योकि यह मसला देश की 25 करोड़ से ज्यादा मुस्लिमों की आस्था एवं परम्परा से जुड़ा है। देश का संविधान सभी धर्म एवं जाति के लोगों को अपनी-अपनी स्थापित धार्मिक परम्पराओं एवं आस्था के अनुरूप पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

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