क्या है गणतंत्र के गण की पहली चुनौती?

26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र को स्थापित हुए 68 साल पूरे हो गए। हम अपने गणतंत्र की 69वीं सालगिरह मना रहे हैं। इस मौके पर एक सवाल बेहद अहम हो जाता है। एक गणतंत्र में गण की सुरक्षा ज्यादा मायने रखती है या तंत्र की?

26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र को स्थापित हुए 68 साल पूरे हो गए। हम अपने गणतंत्र की 69वीं सालगिरह मना रहे हैं। इस मौके पर एक सवाल बेहद अहम हो जाता है। एक गणतंत्र में गण की सुरक्षा ज्यादा मायने रखती है या तंत्र की?

आजादी के बाद देश का तंत्र अखंड और सुचारू है, यह बात संतोष देती है। लेकिन गण का क्या हाल है? क्या देश की आधी आबादी के बिना भारतीय गण की कल्पना की जा सकती? समाज की इकाई परिवार होती है और परिवार का केंद्र महिलाएं। क्या महिलाओं की स्थिति में बेहतरी लाए बिना परिवार और फिर वृहत्तर समाज की बेहतरी की कल्पना की जा सकती है?

आधी आबादी की बेहतरी और संपन्नता का सवाल सबसे अहम है। लेकिन हम मौजूदा भारतीय सामाजिक परिवेश में महिलाओं के हालात का जायजा लेते हैं तो सारे दावे खोखले नजर आते हैं। महिलाओं को सिर्फ हिंसा और जुल्मों का सामना ही नहीं करना पड़ता, बल्कि इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी उनकी स्थित बेहतर नहीं है।

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध की खबरें रोजाना सुर्खियों में रहती हैं। महिलाओं के साथ-साथ बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें मानवता को शर्मसार करती हैं।

महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न और हिंसा कई तरह के रूपों में मौजूद हैं जिनमें हाथापाई, गाली-गलौच, तेजाब छिड़कना, शारीरिक-मानसिक शोषण, बाल विवाह, दहेज हत्या, मानव तस्करी और बलात्कार तक शामिल हैं।

स्कूल, सड़क, दफ्तर, होटल, पार्क, खेत, कारखाना, बाजार, बाथरूम, भीड़, एकांत, शायद ही ऐसी कोई जगह बची हो जहां महिलाएं हिंसा का शिकार नहीं हुई हों।

महिलाओं का शारीरिक शोषण एक महामारी बन चुका है जिसके इलाज की सख्त जरूरत है। संस्कृति और सभ्यता का सिरमौर कहलाने वाला भारत देश भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। लेकिन अब लड़कियां इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगी हैं।

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