शनि की वापसी – कभी उन्नतिकारक कभी मृत्यु कारक

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव 8178677715, 9811598848

ग्रहों की स्थिति का दो प्रकार से विश्लेषण किया जाता है। दोनों ही स्थितियों में इनसे मिलने वाले परिणामों की व्याख्या भी भिन्न भिन्न प्रकार से की जाती है। प्रथम प्रकार में ग्रह हमारी जन्मकुंडली में स्थिर रूप में विराजित है, दूसरे प्रकार में ग्रह वर्त्तमान भचक्र में निरंतर गति कर रहे है।

जीवन को अर्थपूर्ण बनाने में ग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। हमारी जीवन कुंडली वास्तव में हमारे पूर्वजन्मों के फलस्वरूप निर्धारित रोड मैप है, जिसपर चलकर हमें जीवन यात्रा को पूरा करना है।

कुंडली के योग, दशा और गोचर के ग्रह एक उपकरण का कार्य कर रहे है, जो मार्गदर्शन करते हुए हमें दिशा देते है। आज के युवावर्ग अपने उद्देश्यहीन जीवन को दिशा देने के लिए ज्योतिष विद्या का प्रयोग कर अपने जीवन को एक नया आयाम दे सकती है।

जिस क्षण हम पैदा होते हैं, उसी क्षण हमारा भाग्य ग्रहों की ज्योतिषीय स्थिति के द्वारा निर्धारित हो जाता है। हमारी जन्मकुंडली में यह संकेत के रूप में होता है। जिसे एक योग्य ज्योतिषी सरलता से समझ सकता है।

प्रत्येक ग्रह कुछ निश्चित विषयों का कारक होता है। जैसे सूर्य आरोग्यता, चंद्र मन और बुध बुद्धि का कारक है। इसी श्रेणी में शनि है जिन्हें काल, मेहनत, परिश्रम और तनाव का कारक माना गया है।

शनि एक राशि में लगभग ढाई साल रहते है और बारह राशियों में गोचर करने में शनि को लगभग 30 वर्ष का समय लगता है। जन्मकुंडली में स्थिति शनि पर शनि का दोबारा गोचर लगभग 27 से 30 वर्ष की अवधि में होता है।

यह वह समय होता है जब व्यक्ति लगभग अपने करियर में लगभग स्थापित हो चुका होता है या फिर स्थापित होने का प्रयास कर रहा होता है। इससे पूर्व के जीवन में व्यक्ति ने शिक्षा अर्जित कर जो भी योग्यता पायी है उसे प्रयोग करने का यह समय होता है।

शनि को एक ही स्थान पर वापस आने में लगभग 29 वर्ष लगते हैं और उस वर्ष को शनि की वापसी कहते हैं। शनि की यह वापसी व्यक्ति को दुनिया को समझने, जानने और विश्लेषण करने के अवसर देती है। जिसके माध्यम से हम अपने जीवन को दिशा दे सकते है।

हम अक्सर देखते है की हम जीवन की एक सीधी राह में चले जा रहे होते है की किसी चौराहे पर आकर हमें यह निश्चित करना होता है की अब हमें किस ओर जाना है, कौन सी राह पकड़ने पर हम अपने जीवन लक्ष्य को पा सकेंगे। शनि की वापसी का समय वही समय होता है।

जीवन को दिशा देने वाला समय होने के कारण यह समय संकट और संघर्ष का समय होता है। एक ज्योतिषी विद्वान ने एक स्थान पर कहा है की – शनि वह ग्रह है जो हमें सिखाता है, चाहे हम सीखना चाहें या नहीं, वह भी जीवन की मर्यादाओं की विषय में। शनि जिम्मेदारियां देकर परिपक्वय बनाता है, हमें बड़ा अनुभवी बनाता है।

कुछ लोगों को इस समय में यह अहसास होगा की आयु के इससे पूर्व के 20 वर्ष हमने जो बिताये वो शायद सही नहीं थे। यह अहसास असफलता और तनाव का कारण बन सकता है। इस समय में कुछ करीबियों की मृत्यु और स्वयं की नौकरी जाने का समय भी हो सकता है।

कई बार नौकरी जाती नहीं परन्तु नौकरी छूटने की स्थिति अवश्य बन जाती है। शनि गोचर में मिलने वाले फल जन्मपत्री में शनि की स्थिति के अनुसार तय होते है, इसलिए इस अवधि विशेष में मिलने वाले फलों में व्यक्ति अनुसार भिन्नता होना लाजमी है।

श्री अटल बिहारी वाजपेयी
25 – 12 -1924, 05:25, ग्वालियर

भारतीय राजनीति को एक नया आयाम देने वाले श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जीवन के 27 से 30 वर्ष के मध्य का समय अतिमहत्वपूर्ण था। इस समय में अटल जी 1954 में बलरामपुर से मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट चुने गए।

मात्र इस छोटी से आयु में यह पद पाना किसी के भी लिए सम्मान और गौरव का विषय रहेगा। इस पद के साथ ही अटल जी सक्रिय राजनीति का हिस्सा हो गए। इनकी कुंडली में शनि द्वादश भाव में उच्चस्थ अवस्था में है, एवं तृतीयेश व् चतुर्थेश है। इस समय इनकी शनि की साढ़ेसाती भी शुरू हुई जो इनके लिए शुभ और उन्नतिकारक साबित हुई।

जन्म कुंडली में दशा भी शुक्र में शनि की प्रभावी थी। इनके जीवन की इस समयावधि को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की प्रथम सीढ़ी कहा जा सकता है। शनि साढ़ेसाती की इस अवधि ने उनके जीवन को एक दिशा दी और आगे जाकर अटल जी भारतीय राजनीति का धुर्व धारा बन पाएं।

श्री गुलजारी लाल नंदा

गुलजारी लाल नंदा जी के जीवन को दिशा देने का कार्य 1927 में हुआ जब जन्म शनि पर गोचर शनि का विचरण हुआ। गुलजारी लाल नंदा जी की कुंडली मेष लग्न और धनु राशि की है। शनि इनके अष्टम भाव में स्थित है। वृश्चिक राशि में स्थित शनि पर 1925 से 1926 के मध्य रहा। यह समय इन्हें राजनैतिक जीवन में लेकर आया।

श्री इंदिरा गाँधी

शनि 1945 से 1946 की अवधि में शनि इनकी जन्मराशि पर गोचर कर रहे थे, उस समय इनके जीवन में बदलाव हुआ और इंदिरा गाँधी ने पारिवारिक जीवन में माता की भूमिका का आरम्भ लिया। इसके बाद जब शनि दोबारा 1975 में इनके जन्म शनि पर गोचरवश आये तो इन्होने देश में आपातकाल लागू किया।

अपनी सत्ता को बचाने के लिए इन्होंने यह कदम उठाया। जो जीवन के अंत तक इनके लिए आलोचना का कारण बना। 1984 में इनकी मृत्यु के समय शनि इनके चतुर्थ भाव पर गोचर कर, लग्न में स्थित जन्म शनि को प्रभावित कर रहा था, जो इनकी मृत्यु की वजह बना।

जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू जी के जीवन का 1918-1919 वर्ष की अवधि का समय राजनैतिक जीवन में प्रवेश का समय कहा जा सकता है। जवाहरलाल नेहरू इस समय महात्मा गाँधी के संपर्क में आये और इन्होने राजनैतिक जीवन की इनसे इस समय में दीक्षा ली।

यह वह समय था जब इन्होने महात्मा गणाधी के साथ मिलकर रॉलेट रॉलेट अधिनियम ने खिलाफ आंदोलन किया इस समय ही सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी इनकी भूमिका अहम् रही। इसके बाद 1947 से 1948 की अवधि का समय इनके जीवन का सबसे ख़ास समय था क्योंकि ये समय स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने।

तत्पश्चात शनि जब इनके जन्म शनि से गोचर में सप्तम भाव में आये और जन्म शनि को गोचर में सक्रिय किया तो वह समय इनके इस जन्म से परलोक गमन का समय था। यह वर्ष था 1964 का। इनकी जन्म कुंडली कर्क लग्न और कर्क राशि की है। शनि इनकी कुंडली में सिंह राशि में स्थित है। जीवन में शनि भी इनके जन्म शनि से गुजरे, इनका जीवन बदल गया।

श्री नरेंद्र मोदी

अब बात करते है माननीय नरेंद्र मोदी जी की, नरेंद्र मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न और वृश्चिक राशि की है। शनि इनके दशम भाव में सिंह राशि में स्थित है। मोदी जी का जन्म 1950 में हुआ और शनि इनके जन्म शनि पर 1977 पर आये, उस समय नरेंद्र मोदी आर एस एस में महत्वपूर्ण भूमिका में सामने आएं। इसके बाद 2022 से 2023 के मध्य शनि जन्म शनि से सप्तम भाव पर गोचर करेंगे। यह अवधि मृत्यु कारक साबित हो सकती है।

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