सूचना का अधिकार कानून लोक हितकारी है: तेजराम विद्रोही

दीपक वर्मा

अभनपुर।

आज जनमानस में सूचना के अधिकार कानून को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है और कुछ समाचार पत्रों में सूचना अधिकार कानून के ऊपर सवाल खड़ा करने वाला प्रकाशित हुआ है। कुछ का कहना है कि सूचना के अधिकार कानून का दुरुपयोग हो रहा है, सरकारी कामकाज में बाधा पहुंच रही है, कुछ लोग इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं ऐसे में सवाल उठता है कि सूचना का अधिकार कानून जरूरी है या नहीं।

यदि हाँ तो इसका उपयोग किस प्रकार से हो जो किसी भी प्रकार से भ्रम पैदा न करें और न ही सूचना के अधिकार कानून की मूल उद्देश्यों को खंडित करें।

उक्त आशय की प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा के राज्य सचिव कॉमरेड तेजराम विद्रोही ने कहा कि सूचना के अधिकार ने जनता को जानने का हक प्रदान किया है और हर किसी कार्यालय, संस्थान या अधिकारी से पूछ सकता है कि मेरा कार्य क्यों नहीं हुआ?

कब होगा?जनता अपनी गाढ़ी कमाई का हिसाब मांग सकती है कि पैसा कहां, कैसे, कब खर्च हुआ? अब तक कागजों में सड़क,पुल, भवन,कुँए, विकास कार्य दिखा दिए जाते थे परंतु सूचना के अधिकार कानून ने सबकी पोल खोल दी है तथा भ्रष्ट और भ्रस्टाचार पर कुछ हद तक शिकंजा कसा है। लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार करने तथा पारदर्शी समाज के निर्माण में सूचना का अधिकार ” मील का पत्थर ” साबित हो रहा है।

सूचना के अधिकार कानून से सरकारी कामकाज प्रभावित नहीं होता है और न ही बाधा पहुंचती है। सहज रूप से समय सीमा के भीतर जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से ही जन सूचना अधिकारी या सहायक जन सूचना अधिकारी संबंधित विभागों में नियुक्त किया गया है। यह सुनने में आ रहा है कि कुछ लोग सूचना के अधिकार के जरिए डराने, धमकाने या ब्लैकमेल करने का करते हैं। इसमें हमारा कहना है कि किसी भी सूचना अधिकारी को ऐसे धमकियों से घबराना नहीं चाहिए।

वे आवेदक को चाही गई जानकारी समय सीमा के भीतर उपलब्ध करा देवें। जो गलत जानकारी देते होंगे या जो किसी भ्रस्ट कार्य मे लिप्त होंगे और उस जानकारी से जिनका पर्दाफास होने का डर बना रहता है ऐसे लोग ब्लैकमेलिंग का शिकार होते हैं। उन्हें हिम्मत के साथ सामने आना चाहिए और सूचना के अधिकार का बेजा इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ कार्यवाही करना चाहिए।

जो सरपंच या सचिव अपना दस्तावेज पूर्ण नहीं रखते या जहाँ गड़बड़ी होती है वहीं के सरपंच, सचिव या ऐसे विभाग के अधिकारी जानकारी देने से कतराते हैं। यह जानकर ताज्जुब होता है कि एक पंच को अपने ही पंचायत के दस्तावेज के बारे में जानने के लिए सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करने की जरूरत पड़ती है। जबकि वह स्वयं उस पंचायत का पंच सदस्य है उसे तो सीधे ही बिना किसी आवेदन के जानकारी प्राप्त हो जानी चाहिए।

इसका मतलब कुछ जगहों पर सरपंच, सचिव अपने पंचो को ही सही जानकारियां उपलब्ध कराना नहीं चाहते हैं तो आम नागरिकों को क्या जानकारी उपलब्ध कराएंगे? मेरे ख्याल से ऐसे ही लोग सूचना के अधिकार कानून से भयभीत रहते है।

सूचना की अधिकार के तहत जानकारी देने का मतलब है कि आपके पास जो उपलब्ध है उसकी जानकारी प्रदान करना। जन सूचना अधिकारी या सहायक जन सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी है कि दस्तावेज कितनी प्रतियों में है? उसकी सूचना लागत कितनी है? आवेदनकर्ता को इसकी जानकारी देकर चालान या नगद में सूचना लागत राशि जमा करावें। जब राशि जमा करेगा तब वह सूचना प्राप्त करेगा।

यह कानून लोक हितों में है और हर नागरिक इसका इस्तेमाल कर लोक कल्याणकारी कार्यों में मदद करते हुए भ्रस्टाचार मुक्त समाज बनाने में भागीदार बनें। कहीं पर फर्जीवाड़ा दिखाई पड़ता है वहाँ जानकारी लेकर सही फोरम या मंच पर शिकायत किया जा सकता है। डरना, धमकाना या बेजा इस्तेमाल सूचना के अधिकार कानून की मूल उद्देश्यों को खंडित करता है।

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