छत्तीसगढ़

अधिकार पट्टे ने खोला बिरहोर केंदाराम के लिए तरक्की का रास्ता

सरकारी योजनाओं का मिला लाभ, आय के बढ़े स्त्रोत  

हिमालय मुखर्जी ब्यूरो चीफ रायगढ़

रायगढ़, 25 जुलाई2020: परंपरागत वन निवासियों को वन अधिकार पत्र प्रदान कर शासकीय योजनाओं से जोड़ते हुये उनके जीवन में व्यापक बदलाव लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लम्बे समय से वन्य क्षेत्रों में निवासरत लोगों को उनकी पैतृक भूमि व निवास के वन अधिकार को शासकीय दस्तावेज में दर्ज करने से लोगों के जीवन में जबरदस्त बदलाव देखने को मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ में विशेष पिछड़ी जनजाति में शुमार बिरहोर जनजाति के केंदाराम बिरहोर जो कि रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखण्ड के ग्राम खलबोरा में रहते है।

केंदाराम मूलत:

केंदाराम मूलत: इसी विकासखण्ड के ओंगना ग्राम के निवासी थे जो सन् 1980-81 में खलबोरा आकर बस गए। शुरूआत में जीविकोपार्जन के लिये वन्य संसाधनों पर ही निर्भर रहे। धीरे-धीरे उन्होंने वन क्षेत्र के बीच जमीन साफ कर खेती प्रारंभ की और कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज उगाना शुरू किया और सन् 1984 से नियमित रूप से कृषि कार्य कर रहे है। किन्तु जमीन कहीं दर्ज नहीं होने की वजह से शासकीय योजनाओं का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा था और वह मौसम आधारित एक फसलीय खेती ही कर पा रहे थे जिसमें सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं थी तथा उन्हें खाद व बीज भी खुले बाजार से लेना पड़ रहा था।

शासन की योजना से उन्हें 1.580 हेक्टेयर काबिज भूमि में कृषि कार्य हेतु वन अधिकार पत्र मिला। जिसने उनकी उन्नति के मार्ग खोल दिये। वन अधिकार पत्र मिलने के पश्चात शासन की विभिन्न महत्वपूर्ण आय संवर्धन से जुड़ी योजनाओं का लाभ मिलने लगा। सिंचाई हेतु कुआं, बोरवेल (सोलर पम्प)डबरी निर्माण कार्य हुआ। उच्च गुणवत्ता के बीज एवं खाद भी शासन द्वारा दिया जाने लगा। मनरेगा के तहत भूमि का समतलीकरण किया गया।

केंदाराम खरीफ में धान की फसल

जिससे वह खरीफ व रबी दोनों फसल लेने लगे। केंदाराम खरीफ में धान की फसल उगाते है तथा रबी में मक्का व आलू की उपज ले रहे है। उन्होंने इस खरीफ वर्ष में न्यूनतम समर्थन मूल्य में लगभग 80 हजार रुपये का धान बेचा। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रारंभ की गई राजीव गांधी किसान न्याय योजना से न्यूनतम समर्थन मूल्य  2500 रुपये प्रति क्ंिवटल के मान से अंतर राशि की प्रथम किश्त भी उन्हें मिल चुकी है। आलू व मक्का से 15 से 20 हजार रुपए की आमदनी भी उन्हेे पृथक से होती है। इस राशि से अपनी आजीविका स्त्रोत को बढ़ाते हुये 20&20 डबरी में मछली पालन भी शुरू किया है व साथ ही बकरी पालन का कार्य भी प्रारंभ किया है। शासन की इस योजना ने केंदाराम को आर्थिक रूप से पहले से काफी सशक्त बनाया है।

केंदाराम कहते है कि पिछले 40 वर्षो से खेती कर रहे जमीन का मालिकाना हक मिल जाने से बड़ा सुकून है। इससे वह अपनी उपज आसानी से बेच सकते है। जमीन से बेदखल किये जाने का भय भी मन से समाप्त हो गया है। बिरहोर जनजाति मूलत: वनांचलों में रहकर अपनी जीवन निर्वाह के लिए जानी जाती है। किन्तु वन अधिकार पत्र ने उन्हें खेती-किसानी से जोड़ते हुये समाज की मुख्य धारा में शामिल कर दिया है। अपने पोतो को छात्रावास में रखकर अच्छी तालिम भी दिलवा रहा हूं। इससे वे आगे चलकर कुछ अच्छा कर सके। जीवन में इस बदलाव के लिये शासन का हमेशा आभारी रहूंगा।

Tags

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Back to top button