सियासत के ‘संगीत’ से ताज को आंच नहीं, देखा है ताज ने हर दौर के बादशाह को करीब से

जमुना के कोलाहल से गूंजते किनारे पर चांदनी रात में हवाओं के शोर में खामोश खड़ा जो ताजमहल लोगों को अपना दीदार करने को मजबूर करता था उसी ताज की सफेदी पर अब आरोपों के छींटे पड़ रहे हैं.

संगरमरमरी दीवारों पर गद्दारी के दाग चस्पा हो रहे हैं. जिस आगरा को ताज ने दुनिया में पहचान दी उसी उत्तर प्रदेश में इतिहास के पन्नों से ताज के एक-एक गुंबद और खंभों को उखाड़ कर बाहर फेंक देने की बात हो रही है.

हां, अब ताज के अपनी खूबसूरती पर इठलाने के दिन चले गए. अब उसके अपनी बेकसी पर रोने के दिन आ गए क्योंकि अब ताजमहल के इम्तिहान का वक्त आ चुका है.

ताज साबित करे कि वो किसी हमलावर की निशानी नहीं बल्कि हिंदुस्तान की मुकम्मल पहचान है. ताज साबित करे कि वो मुल्क की संस्कृति के लिए कलंक नहीं है. ताज साबित करे कि उसे ‘गद्दारों’ ने नहीं बनाया.

ताज ये भी साबित करे कि वो गुलामी का पुरजोर दस्तावेज नहीं. ताज ये भी एलान करे कि वो हमलावरों की निशानी नहीं बल्कि मुहब्बत के पैगाम की न खत्म होने वाली कहानी है जिसका मकसद गंगा-जमुनी तहजीब को हर पीढ़ी तक जिंदा रखना है क्योंकि अब ताज को खुद के होने की वजह बताने की जरूरत आ गई है.

इसकी इकलौती वजह आज के दौर के सियासत के वो शहंशाह है जो ताज को कलंक मानते हैं. सियासत में ‘ताजनीति’ कुछ इस कदर हावी हो गई है कि अब इतिहास का ‘संगीत’ किसी शोर सा सुनाई देने लगा है.

मेरठ के सरधना से विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को इतिहास का हिस्सा मानने पर ऐतराज जताया है. यूपी सरकार ने पर्यटन की लिस्ट से जिस तरह से ताजमहल को बेदखल किया, उस पर संगीत सोम का कहना है कि ताजमहल भारतीय संस्कृति पर कलंक है और इतिहास बदलने का वक्त आ गया है.

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