छत्तीसगढ़

सरपंच सचिव का अजब गजब आरोप प्रत्यारोप

सोशल मीडिया में सरपंच और सचिव के आरोप प्रत्यारोप के आवेदन पत्र घूम रहे हैं।

ब्यूरो चीफ : विपुल मिश्रा

भरतपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत कुंवारपुर मामला जिस तरह देखने को मिल रहा है उस कहानी के तार जनपद कार्यालय तक जुड़े हैं। कहीं न कहीं वहां से भी भूमिका निभाया जा रहा है। ताकि सरपंचों को कमजोर तथा काबू में किया जा सके। साथ ही उच्च स्तर के तरीके से आसानी से काम कराया जाय। अब जिस तरह से सोशल मीडिया में सरपंच और सचिव के आरोप प्रत्यारोप के आवेदन पत्र घूम रहे हैं। उन्हीं आवेदन पत्रो से कुछ सवाल जरूर बाहर निकल कर आ रहा है।

सरपंच के द्वारा 17/06/20 को कलेक्टर को आवेदन पत्र लिखकर ये बात का अवगत कराया जाता है कि सचिव के द्वारा वृद्धा पेंशन, निराश्रित पेंशन,पेंशन,विधवा पेंशन जैसे जनहित कार्य में लापरवाही की जा रही है जिसकी सूचना कई बार जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को दिया जा चुका है लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मौन है,जैसा कि आवेदन पत्र में उल्लेख है,इसका अर्थ है कि सरपंच जिलाधीश महोदय को आवेदन पत्र देने से पहले जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को इसकी सूचना दी होगी, चूंकि यहां तक जानना जरूरी है।

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अब नया मोड़ आ जाता है सरपंच के द्वारा 17/06/20 को कलेक्टर महोदय को आवेदन पत्र देने के ठीक दो दिन के बाद 20/06/20 को सचिव महोदय जी जनपद पंचायत कार्यालय और थाने में आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सरपंच को घेरने में कसर नहीं छोड़ा। जिसमें सचिव ने जिक्र कर दिया कि 19/06/20 को शासन के निर्देशानुसार ग्राम सभा लगाने पहुंचे तो नया ताला लगा मिला और सरकारी दस्तावेज गुम हो गया है।एक आशंका जाहिर की है कि सरपंच ने ग्राम पंचायत से दस्तावेज निकाल लिया। तो क्या इतने दिन झोलझाल करने के बाद जनहित का कार्य सचिव महोदय करने वाले थे,या सरपंच महोदय के द्वारा जिले में सूचना देने के ठीक दो दिन बाद सचिव द्वारा दस्तावेज़ गुम होने की सूचना देना। कहीं ये अपने बचाव का पहला हथियार तो नहीं जिसके बदौलत सरपंच को कमजोर किया जा सके।

अब सूचना के बाद भूमिका निभाने की जिम्मेदारी विकासखंड भरतपुर के अधिकारियों की जो अब दो माह बीत गया और आज तक निराकरण नहीं किया गया जिनकी भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रहा है। ऐसे में उन ग्रामीण पेंशनधारियों का क्या कसूर जो अपने सरकारी अधिकार से अभी तक वंचित हैं। जिनकी बदौलत सरकार बनती है, और जिम्मेदार पद में बैठे अधिकारी जनहित मुद्दे को लटकाकर एक ग्राम के जनप्रतिनिधि के टूटने का इंतजार करने में रहते हैं। जबकि इस मामले को गंभीरता से लेकर आसानी से अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में सछम होते हैं।

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