ज्योतिष

जीवन की अवस्थाएं पर शनि प्रभाव

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री “श्री मां चिंतपूर्णी ज्योतिष संस्थान 5, महारानी बाग, नई दिल्ली -110014 8178677715

पौराणिक कथाओं और ज्योतिष शास्त्रों में शनि को काल समान कहा गया है। कुछ शास्त्रों में शनि को महान शिक्षक की उपाधि भी दी गई है। कुछ के लिए शनि जीवन की कठिन परिस्थितियों में मार्गदर्शक का कार्य करने वाला कठोर शिक्षक है तो किसी के लिए शनि जीवन की ऊंचाईयां देने वाला शुभ ग्रह है। शनि जीवन में भौतिक वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करता है। यह मन और आत्मा से परे और समय की सीमाओं के विपरीत भी कार्य करता है। यह उस दुनिया का प्रतीक है जिसमें हमारा विस्तार होता है और स्व की भावना का निर्माण होता है। यहां शनि सामाजिक वातावरण से संबंध रखता है। मनुष्य का अनुभव और अस्तित्व के निर्माण में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शनि को सहज शब्दों में समय, अनुभव, दुनिया, समाज, सीमाएं, आत्मविनियमन और सीखने का विकास कहा जा सकता है। हमारे जन्म के साथ ही शनि की स्थिति से गोचर के शनि की स्थिति आगे बढ़्ती है और लगभग शनि के गोचर के साथ हमारा व्यक्तिगत विकास और परिपक्वता में बदलाव होने लगता है। हमारे संपूर्ण जीवन वक्र में शनि के गोचर को विभिन्न चरणों में चिह्नित किया जा सकता है इससे पूरे मानव जीवन काल को रेखांकित किया जा सकता है। शनि का जन्म शनि पर गोचर वापसी जिसे शनि चक्र का नाम दिया जा सकता है, यह लगभग 28 सालों में पूरा होता है। शनि की गति कभी तेज और कभी मंद रहती है। 12 राशियों में अपना गोचर तय करने में शनि को लगभग 27 से 30 वर्ष का समय लग सकता है। जिसमें साढ़ेसाती के समय अवधियों का अनुभव भिन्न हो सकता है। इस प्रकार पूरे जीवन काल में शनि हमारी जन्म राशि पर 3 या 4 बार गोचर कराता है। इन सभी चक्रों में शनि से प्राप्त होने वाले फल अलग-अलग होते है।

बचपन में शनि साढेसाती का प्रभाव

4 से 7 साल की आयु के बच्चों में जब शारीरिक विकास हो रहा होता है, उस उम्र में बच्चों का भावनात्मक और मस्तिष्क का केंद्र विकास कर रहा होता है। इस आयु में बालक तर्कसंगत-विचार, समस्या समाधान, योजना और ध्यान आदि विषय मस्तिष्क में विकसित हो रहे होते है। सामान्यत: हमारे समाज में स्कूली शिक्षा 4 से 5 वर्ष की आयु में शुरु होती है। इस आयु में शनि का प्रभाव बालक को जिद्दी और मनमर्जी का बनाता है। कुछ तनावों का उसे सामना करना पड़ता है। जिसे स्नेह से समझने और समझाने की आवश्यकता होती है। ऐसे बालकों को स्कूल का वातावरण न केवल शैक्षणिक शिक्षा प्रदान करता है, बल्कि सामाजिक नियमों और अपेक्षाओं के साथ नए अनुभव भी प्रदान करता है। इस अवस्था में बालकों को आत्म-संतुलन की आवश्यकता होती है, जिसके परिणामस्वरूप आत्म- जागरूकता और आत्म-समझ का विस्तार होता है। विकास के इन पहलूओं में शनि उसे स्वयं को नियम में बांधना, सभी के साथ समायोजन करना और आत्म अनुभव से सीखता है।

यौवन

मानव विकास श्रंखला में शरीर और मस्तिष्क का अगला विकास 14 वर्ष की आयु जिसे हम सभी किशोरावस्था के नाम से जानते है। यह आयु यौन और सामाजिक परिपक्वता के शुरुआत की होती है, इस आयु में किशोर युवा और वयस्क बनने के ओर कदम रखता है, और स्वयं की सामाजिक पहचान को महत्व देता है, इसके साथ ही इस समय में लिंग पहचान भी विकसित होनी शुरु होती है। यह वह समय है जब किशोर अपने माता-पिता से स्वतंत्रता चाहता है और स्वयं को एक अलग इकाई मानता है। यहां शनि जन्म शनि से ठीक सामने सप्तम भाव पर होने के कारण जन्म शनि को पूर्ण प्रभावित करता है। कानूनी रुप से वयस्क इस आयु में शनि की साढ़ेसाती प्रभावी हो तो व्यक्ति समाज में अपनी पहचान बना रहा होता है। इस आयु में व्यक्तित्व का विकास हो रहा होता है और अपनी समस्याओं का समाधन वह स्वयं करता है। इस आयु में इसकी पहली नौकरी, या पहला खुद का अपार्टमेंट, या दुनिया की यात्रा, पुनर्वास या पहली शादी जैसे कई अनुभव इस समय होते हैं। इस आयु में उसमें उत्साह और जोश होता है, जीवन में आगे बढ़ने और स्वयं की योग्यता सिद्ध करने की हिम्मत होती है। दुनिया का सामना कर वह अपने अनुभवों को बेहतर करता है। यह अनुभव उसे समृद्धि और परिपक्वता की ओर लेकर जाते है। इस समय शनि की साढ़ेसाती की दूसरी बार वापासे हो सकती है और इसे परिपक्वता का मार्ग कहा जा सकता है।

वयस्कता

शनि पर गोचर शनि वापसी कर रहा होता है यह आयु 28 वर्ष की होती है। हमने क्या पाया और हमने क्या सीखा यह वह आयु होती है। मुख्य रुप से आयु का 28, 35, 42 और 49 आयु का वर्ष विशेष होता है। आयु की इन अवस्थाओं में जातक पर जन्म शनि का शनि पर गोचर, शनि साढ़ेसाती या शनि ढ़ैय्या चल रही होती है। और व्यक्ति आयु की इन अवस्थाओं में बाहरी परिस्थितियों को एक चुनौती के रुप में स्वीकार करता है। करियर में स्थिरता और अपना व्यवसाय शुरु करने जैसे विचार उसके मन में इस समय आते है। संतान और परिवार की जिम्मेदारियॊं को पूरा करने के लिए सारा ध्यान व्यक्ति का अपने परिवार और दायित्वों पर होता है। इसके बाद 49 की आयु और 56 की आयु में भी शनि का विशेष प्रभाव जातक पर रहता है। शनि अपने प्रत्येक प्रभाव में अनुभवों का निर्माण, पुनर्निमाण, सीखना, परिपक्वता और जिम्मेदारियों को लेना सीखाता है। शनि गोचर की इन लयों को समझने के बाद निश्चित रुप से हम अपने अनुभवों के द्वारा जीवन को एक नया आकार देंगे और जीवन को आगे बढ़ायेंगे।

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