राजनीति

योगी आदित्यनाथ को भाजपा आलाकमान ने दिया दूसरा झटका. क्या है दोनों झटके ?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ भाजपा की पहली पसंद नही थे. हालांकि परिस्थितिवश मुख्यमंत्री बनने में वह कामयाब जरूर रहे. भाजपा शीर्ष नेतृत्व के उनके सीएम बनने के बाद के दो फैसले इस हकीकत की पुष्टि भी करते हैं.

कोलकाता : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ भाजपा की पहली पसंद नही थे. हालांकि परिस्थितिवश मुख्यमंत्री बनने में वह कामयाब जरूर रहे. भाजपा शीर्ष नेतृत्व के उनके सीएम बनने के बाद के दो फैसले इस हकीकत की पुष्टि भी करते हैं.

पहला झटका योगी आदित्यनाथ को तब लगा था जब शिवप्रताप शुक्ल को मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में मंत्री बनाया गया था. दूसरा झटका योगी आदित्यनाथ को अब लगा है जब गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में उपेंद्रदत्त शुक्ल को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है. दोनों ही शुक्ल, योगी आदित्यनाथ के कारण चुनावी राजनीति से एक दशक से भी अधिक समय से हाशिये पर थे.

पहला झटका शिवप्रताप शुक्ल

जिस शिवप्रताप शुक्ल को योगी आदित्यनाथ विधायक व सांसद नहीं बनने देना चाहते थे, अब वह केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री हैं. शिवप्रताप शुक्ल भी गोरखपुर से ही आते हैं. बीजेपी में इन्हें ब्राह्मणों के एक प्रभावी चेहरे को तौर पर देखा जाता है. योगी भी गोरखपुर से ही हैं और इन्हें राजपूतों का बड़ा नेता माना जाता है. ऐसे में दोनों के मध्य लड़ाई भी होनी थी.

साल 1996 में योगी और शिवप्रताप शुक्ल की लड़ाई तब शुरू हुई, जब लगातार चार बार गोरखपुर से विधायक रहे शिवप्रताप शुक्ल को टिकट देने का योगी ने विरोध कर दिया. सांसद योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यहां से राधामोहन अग्रवाल को टिकट दिया जाए.

बीजेपी ऐसा करने को तैयार नहीं हुई, तो योगी ने राधामोहन अग्रवाल को हिंदू महासभा से चुनाव लड़वा कर जितवा भी दिया. दोनों के बीच यहीं से राजनीतिक अदावत शुरू हुई थी. आलम यह हो गया था कि योगी ने शिवप्रताप शुक्ल की पूरी सियासत ही खत्म कर दी.

पराजित होने के बाद शिवप्रताप शुक्ल बीजेपी में साइड लाइन कर दिए गए थे लेकिन धैर्य और पार्टी के प्रति उनकी वफादारी खत्म नहीं हुई और इसी के दम पर राजनीति में उनकी दोबारा वापसी हुई.

2016 में जब इन्हें राज्यसभा का टिकट दिया गया था तब भी योगी नही चाहते थे कि इन्हें टिकट मिले. शुक्ल फिर भी सांसद बने और अब केंद्र में कलराज मिश्र व महेन्द्रनाथ पांडे की जगह उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण चेहरा भी बन गए हैं.

दूसरा झटका उपेंद्रदत्त शुक्ल

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके द्वारा रिक्त गोरखपुर लोकसभा सीट पर 11 मार्च को उपचुनाव है. योगी चाहते थे की उनके द्वारा खाली की गई सीट और मुख्यमंत्री होने के कारण दोनों ही स्थिति को देखते हुए उनके पसंद का व्यक्ति पार्टी का उम्मीदवार बने.

योगी चाहते थे कि स्वामी चिन्मयानंद चुनाव लड़ें लेकिन चिन्मयानंद ने 14 फ़रवरी को योगी के ऑफर को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया यह कहते हुए की किसी स्थानीय व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया जाये जो सभी जाति व वर्ग के लोगों को लेकर चल सकें. चिन्मयानंद दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोंडा जिला के रहने वाले हैं.

अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद लोकसभा के लिए 1991 में बदायूं से, 1998 में मछलीशहर से और 1999 में जौनपुर से चुने गए थे. चिन्मयानंद के ना करने के बाद योगी 18 फ़रवरी को दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मिले. वहां प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्रनाथ पांडे भी मौजूद थे.

योगी ने स्वामी कमलनाथ का नाम सुझाया. गौरतलब है कि स्वामी कमलनाथ, योगी आदित्यनाथ की अनुपस्थिति में गोरखनाथ मंदिर के मुख्य पुरोहित का दायित्व संभालते हैं. अमित शाह ने संग संग कहा कि मैं चाहता हूं कि उपेंद्रदत्त शुक्ल उम्मीदवार बनें.

महेन्द्रनाथ पांडे ने कहा कि मैं इसका समर्थन करता हूं. योगी ने पुनर्विचार करने का अनुरोध किया लेकिन अमित शाह ने कहा कि नाम फाइनल. 2006 में गोरखपुर के कौरीराम विधानसभा सीट से उपेंद्रदत्त शुक्ल निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से उपचुनाव लड़े थे.

चुनाव तो हार गए लेकिन भाजपा के उम्मीदवार शीतल पांडे को भी नहीं जीतने दिए. शीतल पांडे, सपा के रामभुआल निषाद से 10629 मतों से चुनाव हार गए जबकि उपेंद्रदत्त शुक्ल को 17635 मत मिला था. दरअसल, उपेंद्रदत्त शुक्ल का टिकट कटवाकर शीतल पांडे को टिकट योगी ने ही दिलवाया था.

इसके बाद उपेंद्रदत्त शुक्ल चुनावी राजनीति के हाशिये पर धकेल दिए गए. बहरहाल, लगभग तीन दशक बाद गोरखपुर का भाजपा उम्मीदवार गोरखनाथ मंदिर से जुड़ा हुआ नहीं है.

बसपा को छोड़ हर कोई मैदान में

गोरखपुर उपचुनाव में नामांकन पत्र दाखिल करने वाले 17 में से 7 प्रत्याशियों का पर्चा तकनीकी गड़बड़ी में खारिज हो गया. सपा से सिंबल नहीं मिलने के बावजूद खुद को सपा का अधिकृत प्रत्याशी बताने वाले नगीना प्रसाद साहनी के पर्चे में अधिकार प्रमाण पत्र और प्रस्तावक न होने से खारिज किया गया वहीं अन्य छह नामांकन पत्रों में भी तकनीकी त्रुटि पाई गई.

सर्वोदय भारत पार्टी से गिरीश नारायण पांडे के दो सेट में से एक खारिज हो गया. बसपा को छोड़कर प्रायः सभी दलों के उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं. भाजपा के उपेंद्रदत्त शुक्ल, सपा के प्रवीण नारायण निषाद, कांग्रेस की डॉ. सुरहीता करीम, सर्वोदय भारत पार्टी के गिरीश नारायण पांडे और बहुजन मुक्ति पार्टी के अवधेश निषाद मैदान में हैं.

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