सेवा समर्पण- सुशासन के 20 साल, पूर्वोत्तर चला विकास की राह

पीएम नरेंद्र मोदी,सेवा समर्पण, सुशासन के 20 साल, पूर्वोत्तर चला विकास की राह

पीएम नरेंद्र मोदी कहते हैं कि ‘न्यू इंडिया तभी विकसित हो पाएगा जब पूर्वी भारत- नॉर्थ ईस्ट का तेज गति से विकास होगा’। प्राकृतिक सौन्दर्य और भूसंपदा का खजाना पूर्वोत्तर लंबे समय तक हाशिये पर ही रहा। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस क्षेत्र का भाग्योदय हुआ। सेवा और समर्पण का मिशन लिए नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर को वो नायाब हीरा दिया, जिसने उसे अष्टलक्ष्मी बना दिया। हीरा (HIRA) का मतलब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बताते हैं हाइवे, इन्लैन्ड वाटरवे, रेलवे और एयरवे।

बोगीबिल पुल बना पूर्वोत्तर की शान

पूर्वोत्तर के विकास के बिना भारत का विकास असंभव है। हीरा का करिश्मा देखने के लिए आइए चलें असम, जिसे पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यहां है भारत का सबसे लंबा रेल कम रोड ब्रिज। इस ब्रिज के बनने से जो इलाका कभी ब्रह्मपुत्र के सैलाब में डूबा रहता था वहां अब धान के खेत लहला रहे हैं। बाढ़ के पानी को बांध दिया गया है, जिसका उपयोग यहां रहने वाले लोग अपने खेतों करते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी पर बने इस पुल की लंबाई तकरीबन 4.9 किमी है। जिसकी वजह अरुणाचल और असम का सफर काफी आसान होगया है। सुरक्षा रणनीति के नजरिए इस पुल को बहुत अहम माना जा रहा है। इस पुल को बोगीबिल के नाम से जाना जाता है।

पीएम ही नहीं हर मंत्री का ध्यान है पूर्वोत्तर पर

सेवा और समर्पण भाव से अकेले पीएम मोदी ही नहीं बल्कि उनके तमाम मंत्री सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस इलाके के विकास में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसी साल रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन द्वारा निर्मित 12 सड़कों को देश को समर्पित किया। बीआरओ ने यह काम कोविड के दौरान किया, जो काबिले-तारीफ है। सीमा पर तेजी से फेलते सड़कों के जाल से क्षेत्र को आर्थिक मजबूती भी मिलेगी। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह इस अवसर पर कहते हैं कि यह क्षेत्र 5 देशों की सीमाओं से सटा हुआ है। इसके मद्देनजर यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है। इसके विकास से देश की सुरक्षा का भी विकास भी होगा।

ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे चार लेन की सुरंग का होगा निर्माण

भारत पूर्वोत्तर की सीमा तक अपने सड़क बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रहा है। इसके साथ ही अब केंद्र सरकार इसी साल के अंत में यानि दिसम्बर माह से ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे चार लेन की सुरंग का शुभारंभ करने जा रही है। जी हां, अब ब्रह्मपुत्र नदी में पानी के भीतर रणनीतिक महत्व की 15.6 किलोमीटर लंबी जुड़वां सड़क सुरंग बनाई जाएगी। केंद्र सरकार और सैन्य संचालन निदेशालय ने भी इस परियोजना पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दे दी है।

12,807 करोड़ रुपये की लागत का है प्रोजेक्ट

लगभग 12,807 करोड़ रुपए लागत वाले इस प्रोजेक्ट से न केवल असम राज्य के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की सुरक्षा होगी बल्कि इस सुरंग के जरिए अरुणाचल प्रदेश की कनेक्टिविटी देश के अन्य हिस्सों से और मजबूत हो सकेगी।

पर्यटन को मिल रहा है बढ़ावा

उत्तर-पूर्व में पर्यटन को बड़े स्तर पर प्रमोट करने को लेकर सरकार काफी सजग और लगातार अवसरों को तलाश रही है। उत्तरपूर्वी राज्यों में पर्यटन की असीमित संभावनाएं व्याप्त हैं। सरकार इन्हीं संभावनाओं का लाभ उठाना चाहती है। जिससे न सिर्फ उत्तर-पूर्वी राज्यों का क्षेत्रीय विकास हो बल्कि साथ ही उनके लिए आर्थिक तरक्की के द्वार भी खुल सकें। इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए सरकार इस दिशा में कई प्रयास कर रही है।

स्वदेश दर्शन’ और ‘प्रशाद’ जैसी योजनाओं से दिया जाएगा बुनियादी ढांचों को बढ़ावा

पर्यटन मंत्रालय अपनी बुनियादी ढांचा विकास योजनाओं के तहत, ‘स्वदेश दर्शन’ और ‘प्रशाद’ जैसी योजनाओं से राज्यों को विभिन्न पर्यटन स्थलों पर बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है। ये योजनाओं के तहत तीर्थयात्रा कायाकल्प और आध्यात्मिक, विरासत संवर्धन अभियान पर राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं। स्वदेश दर्शन योजना के तहत विभिन्न विषयों के तहत टियर II और टियर III के गंतव्यों पर पर्यटन विकास किया जाता है। पर्यटन मंत्रालय ने स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत पूर्वोत्तर क्षेत्र में 1300 करोड़ रुपये से अधिक की 16 परियोजनाओं जैसे पूर्वोत्तर, विरासत, इको सर्किट, आध्यात्मिक, आदिवासी आदि को मंजूरी दी है।

पूर्वोत्तर में अपनी तरह का पहला उत्कृष्टता केंद्र बनेगा

लगभग 50 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश के पापुम पारे जिले के किमिन क्षेत्र में बन रही है। परियोजना के तहत नई इमारत के साथ-साथ अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण पूरा हो चुका है। बताया गया है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा पूर्वोत्तर में अपनी तरह का पहला उत्कृष्टता केंद्र होगा।

बायोटेक्नोलॉजी विभाग के इस जैव-संसाधन केंद्र की स्थापना से पूरा उत्तर पूर्वी क्षेत्र अपने फल व जैविक खाद्य क्षमता का अधिकतम सीमा तक उपयोग कर पाएगा। इसके अलावा यह बढ़े क्षेत्रों में अब तक कम ज्ञात या अज्ञात नई वनस्पतियों की विविध प्रजातियों को खोजने में भी सहायता करेगा। इसका प्रभाव पूरे उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार के रूप में होगा।

कई तकनीकी परियोजनाओं को किया जा रहा है शुरू

पूर्वोत्तर में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी व सैटेलाइट इमेजिंग सहित विभिन्न तकनीकों के सर्वश्रेष्ठ उपयोग के माध्यम से कई परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। केन्द्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि एक समय में निधियों के दुरुपयोग को लेकर आरोप-प्रत्यारोप होते थे, लेकिन अब हमारे पास सैटेलाइट इमेजिंग के माध्यम से उपयोगिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने व ई-ऑफिस और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साधनों के जरिए परियोजनाओं को मंजूरी देने देने के लिए एक पूरा तंत्र है। इससे प्रक्रिया में तेजी आई है।

पूर्वोत्तर में बढ़ रही है हवाई कनेक्टिविटी

देश के सभी राज्यों में हवाई कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार का विशेष फोकस है। इसी के तहत केंद्र के आरसीएस-उड़ान (क्षेत्रीय संपर्क योजना- उड़े देश का आम नागरिक) योजना चला रही है। इसी के तहत पूर्वोत्तर के इम्फाल (मणिपुर) और शिलांग (मेघालय) के बीच पहली सीधी उड़ान सेवा की शुरुआत हो चुकी है। इस मार्ग का संचालन पूर्वोत्तर भारत के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में हवाई संपर्क को मजबूत करने संबंधी भारत सरकार के उद्देश्यों को पूरा करता है। शिलांग उड़ान योजना के तहत इंफाल से जुड़ने वाला दूसरा शहर है।

उड़ान 4 बोली प्रक्रिया के दौरान विमानन कंपनी इंडिगो को इंफाल-शिलांग मार्ग आवंटित किया गया था। हवाई किराये को आम लोगों के लिए उपयुक्त रखने के लिए उड़ान योजना के तहत विमानन कंपनी को वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ) प्रदान की जा रही है। विमानन कंपनी इस मार्ग पर सप्ताह में चार उड़ानों का संचालन करती है और अपने 78 सीटों वाले एटीआर 72 विमानों को तैनात रखती है। फिलहाल इंडिगो 66 उड़ान मार्गों पर परिचालन कर रही है।

क्या है उड़ान योजना

बता दें कि उड़ान योजना के तहत अब तक 361 मार्गों और 59 हवाई अड्डों (5 हेलीपोर्ट और 2 वाटर एयरोड्रोम सहित) का परिचालन शुरू किया जा चुका है। इस योजना की परिकल्पना देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मजबूत हवाई संपर्क स्थापित करने के लिए की गई है, जो भारत के विमानन बाजार में एक नया क्षेत्रीय श्रेणी की नींव रखती है।

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