परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से जुड़ा है हर नागरिक का जीवन

मनुष्य की सेवा के उजाले में जीवन की बढ़ती है खूबसूरती

स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण देता है। यह समझने की जरूरत है कि व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं है, वह परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से जुड़ा है। अपने लिए जीने का अर्थ है अपने सुख की तलाश और इसी सुख की तलाश ने अनेक समस्याएं पैदा की हैं।

सामाजिक जीवन का एक आधारभूत सूत्र है सापेक्षता। निरपेक्ष व्यक्तियों का समूह भीड़ हो सकती है, समाज नहीं। जहां समाज होगा वहां सापेक्षता होगी। और जहां सापेक्षता होगी वहां सहानुभूति, संवेदनशीलता और आत्मीयता होगी।

किसी भी संस्था, समाज, देश या राष्ट्र की शक्ति एवं सफलता का आधार है सापेक्ष सहयोग, आपसी प्रतिबद्धताएं। जिस समाज से जुड़े व्यक्ति समूह के हितों के दीयों में अपनी जिंदगी का तेल अर्पित करने की क्षमता रखते हों वही समाज संचेतन, प्रगतिशील, संवेदनशील और संजीदा होता है।

अनेक संगठनों ने सेवा, सहयोग एवं संवेदना की दृष्टि से एक स्वतंत्र पहचान बनाई है। स्वामी नारायण वाले हों या इस्कान वाले, कोई अणुव्रत का मिशन हो या सुखी परिवार अभियान-इनकी विभिन्न संस्थाएं सेवामूलक जनकल्याणकारी प्रवृत्तियों से जन-जन को अभिप्रेरित कर रही हैं।

रोग या बुढ़ापे की स्थिति में हमारा क्या होगा? इस चिंता से ये संस्थाएं और उनसे जुड़े लोग निश्चिंत करते हैं। हमें भी सेवा का दर्शन अपनाते हुए अपने जीवन के साथ इसे जोड़ना है। इसे जोड़ने का अर्थ है कि हम खुद के लिए जीते हुए औरों के लिए भी जीने का प्रयत्न करें।

व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समूहगत भावना से जहां, जब, जो भी हो, उसमें हिस्सेदार बनें। इस भावना के विकास का अर्थ होगा कि हमारी संवेदनशीलता जीवंत होगी। सड़क पर पड़े आदमी की सिसकन, भूखे-प्यासे-बीमार की आहें, बेरोजगार की बेबसी, अन्याय और शोषण से प्रताड़ित आदमी की पीड़ा-ये सब स्थितियां हमारे मन में करुणा और संवेदना को जगाएंगी।

यह जागी हुई करुणा और संवेदना हमें सेवा और सहयोग के लिए तत्पर करेगी। इस तरह की भावना जब हर व्यक्ति में उत्पन्न होगी तो समाज उन्नत बनेगा, सुखी बनेगा और सुरक्षित बनेगा।

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