सामाजिक बंधनों के कारण ‘विधवाओं के गांव’ में विधवाओं की नहीं हो सकती शादी

देहरादून. 28 साल की रचना शुक्ला अपनी जिंदगी अकेले ही खामोशी से जी रही हैं। रचना की जिंदगी गांव की उन 31 विधवाओं जैसी ही है जिनके पति केदारनाथ त्रासदी में गुजर गए। देअलीभंगीराम रुद्रप्रयाग जिले का वैसे तो एक आम सा ही गांव है, लेकिन इस गांव को लोग अब ‘विधवाओं के गांव’ के नाम से जाना जाता है। 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी में 54 पुरुषों की मौत हुई थी, जिनमें से 32 विवाहित थे।

इस त्रासदी के 4 साल बाद भी इनमें से ज्यादातर महिलाएं अपनी जिंदगी अकेले ही जी रही हैं। ज्यादातर महिलाओं के पति मंदिर में पुजारी का काम करते थे। इनमें से कुछ की उम्र बहुत कम है, लेकिन फिर भी दुबारा शादी कर नई जिंदगी शुरू करने के बारे में सोच भी नहीं सकतीं। रचना शुक्ला ने हालांकि अपने लिए अलग रास्ता चुना और वह अब देहरादून में रहकर पढ़ाई कर रही हैं। रचना कहती हैं, ‘कई ऐसी विधवाएं हैं जो फिर से शादी करना चाहती हैं, लेकिन सामाजिक बंधनों के कारण यह कह नहीं सकतीं।’

हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए अपना असली नाम छुपाने की शर्त पर एक और विधवा ने अपनी राज रखी। उन्हें डर है कि इससे गांव में रह रहे उसके परिवार की सुरक्षा पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, ‘कई सामाजिक संस्थाएं गांव में विधवाओं की जिंदगी संवारने का काम कर रहे हैं। आर्थिक सहायता के साथ जरूरी है कि सामाजिक मानसिकता में भी बदलाव आए। हमारे गांव के लोग विधवाओं के फिर से शादी करने का सख्त विरोध करते हैं।’

दो बच्चों की मां 31 साल की रजनी देवी की भी कुछ ऐसी ही राय है। उन्होंने कहा, ‘कुछ लड़कियों के पति की मौत बहुत कम उम्र में हो गई और पहले पति से कोई संतान भी नहीं है। ऐसी लड़कियों को फिर से शादी करने की अनुमति होनी चाहिए ताकि वह अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू कर सकें। उनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी है और यह बहुत क्रूर तरीका है कि किसी को जबरन सारी जिंदगी अकेले बिताना पड़े।’

गांव में ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं और जीविका के लिए पुजारी का काम करते हैं। वेद प्रकाश गांव के प्रधान हैं और उनका कहना है कि उच्च वर्ण को लेकर कई सारे सामाजिक बंधन होते हैं। इस वजह से विधवाओं को फिर से शादी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, ‘हमारे क्षेत्र में आज तक एक भी ऐसी घटना नहीं हुई है जिसमें किसी विधवा की फिर से शादी हुई हो।’

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