श्याम वेताल (दो टूक) : शाह टास्क से छूटा पसीना

श्याम वेताल
पिछले दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तीन दिन के छत्तीसगढ़ दौरे पर यहां आए थे. तीन दिनों के प्रवास में उन्होंने राज्य के मंत्रियों, सांसदों और पार्टी पदाधिकारियों की जमकर क्लास ली. उन्होंने राज्य में जो काम हुए हैं उनका जायजा लिया और यह जानने की कोशिश की कि भाजपा यहां चौथी पारी हासिल कर पाएगी या नहीं ? लगभग दो दर्जन बैठकों के बाद उन्होंने क्या निष्कर्ष निकाला यह स्पष्ट नहीं हो सका किंतु जाने से पहले यहां के मंत्रियों, सांसदों एवं पदाधिकारियों को नब्बे में से 65 से अधिक सीटें जीतने का ‘टास्क’ देकर गए हैं. उन्होंने 6 महीने बाद समीक्षा करने का भी वादा किया है.
छत्तीसगढ़ में अब तक हुए तीन विधानसभा चुनाव में भाजपा को कभी दो तिहाई सीटें भी नहीं मिली और राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तीन चौथाई सीटें जीतने के लिए फरमान जारी कर दिया है. अध्यक्ष के इस फरमान से पार्टी के मुख्या का पसीना छूट गया है. सभी माथा पकड़ कर अंदर ही अंदर घुट रहे हैं.
उधर, अमित शाह के भक्तों का कहना है कि अध्यक्ष जी ने जो चाहा है, जो बोला है वह करके दिखाया है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का उदाहरण सामने हैं. किसी भी राजनीतिक पंडित ने यह अनुमान नहीं लगाया था कि भाजपा को 325 सीटें मिलेंगी लेकिन अमित शाह को पक्का भरोसा था कि यूपी में ऐतिहासिक जीत होगी. उन्होंने वहां से 265 प्लस का लक्ष्य निर्धारित किया था और लक्ष्य से कहीं ज्यादा सीटें जीतने का श्रेय पाया. अब गुजरात में विधानसभा चुनाव होना है. गुजरात के लिए अमित शाह ने 150 सीटों का लक्ष्य रखा है. 182 सीटों वाली विधानसभा में अभी भाजपा की 123 सीटें है.
छत्तीसगढ़ के बारे में अमित शाह का गणित है कि भाजपा ने अभी तक जिन-जिन सीटों पर दर्ज की है वे सभी पार्टी के खाते में वापस आनी चाहिए. कहने का तात्पर्य यह है कि भाजपा की मौजूदा सीटों के अलावा वे सभी सीटें जो भाजपा की थी और आज नहीं है, फिर वापस पार्टी को मिलनी चाहिए. अभी भाजपा के पास 49 सीटें हैं जबकि कांग्रेस के 39 विधायक हैं. एक बसपा की सीट है तो एक निर्दलीय विधायक है. जो 15 सीटें पहले कभी भाजपा की रही और आज नहीं है उनमें सरगुजा एवं दुर्ग की 4-4 सीटें, बस्तर की 3 सीटें और रायपुर एवं महासमुंद की 2-2 सीटें शामिल है.
अमित शाह का यह गणित सामान्य अंकगणित लगता है लेकिन छत्तीसगढ़ भाजपा के समक्ष जो विषमताएं हैं उनके कारण यह अलजेबरा और ट्रिग्नोमेट्री की तरह डिफिकल्ट लग रहा है.
जहां तक विषमताओं का प्रश्न है उनमें पहली और सबसे कठिन परिस्थितियां यह है कि मौजूदा भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बेसी फैक्टर खड़ा रहेगा. दूसरी समस्या पार्टी के अंदर असंतोष का होना और सतत बढ़ना. इसके अलावा, चुनाव आने तक टिकट मांगने वालों की लंबी कतार लगने की संभावना. उधर, प्रतिपक्ष अर्थात कांग्रेस का दिन प्रतिदिन मजबूत होना भी भाजपा के लिए बड़ी समस्या है.
इतनी विपरीत परिस्थितियों में   65 प्लस की कल्पना करना हास्यास्पद लगता है लेकिन आजकल राजनीति में चमत्कार हो रहे हैं. छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी कोई चमत्कार हुआ तो राज्य में एक बार  फिर भाजपा सरकार आएगी और अपनी चौथी पारी खेलेगी.
Back to top button