पड़ोसी देशों के माहौल में बदलाव के संकेत, भारत की चिंता बढ़ी

अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप नहीं करने की भारत की पारंपरिक नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।

अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की संख्या घटाने के फैसले के बाद जिस तरह पड़ोसी देशों के माहौल में बदलाव आने के संकेत है उससे भारत की चिंता बढ़ गई है।

खास तौर पर पाकिस्तान समर्थित तालिबानी धड़े को मिल रही अहमियत भारतीय कूटनीति के लिए बड़ा सिरदर्द है।

सरकार के शीर्ष कूटनीतिक अधिकारी इन चुनौतियों को स्वीकार करते हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप नहीं करने की भारत की पारंपरिक नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।

अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की संख्या 15 हजार से घटाकर 8,000 करने के फैसले के बाद पाकिस्तान और चीन के बीच अफगानिस्तान को लेकर वार्ता शुरू हो गई है।

बदले माहौल में तालिबान विरोधी ईरान ने भी उनके प्रतिनिधियों से वार्ता शुरू कर दी है।

रूस पहले से ही तालिबान की अगुआई में अफगान समस्या के समाधान को लेकर सक्रिय है। दूसरी तरफ, तालिबान को लेकर भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है।

असलियत में अभी भारत और अफगानिस्तान की अशरफ घनी सरकार ही बचे हैं जिनकी तालिबान से सीधी बातचीत नहीं हो रही है।

विदेश मंत्रालय के उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है कि तालिबान के साथ बातचीत नहीं करने को लेकर भारत अपनी नीति पर अडिग है।

लेकिन हम अफगानिस्तान में शांति बहाली के हर कदम का समर्थन करेंगे क्योंकि भारत के हित सीधे तौर पर उससे जुड़े हैं।

सनद रहे कि भारी अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप नहीं करने की नीति अख्तियार की हुई है।

दूसरी तरफ, भारत अफगानिस्तान को दूसरे तरीके से मदद पहुंचाने में जुटा है। भारत वहां चार अरब डॉलर की परियोजनाएं लगा चुका है और 2.5 अरब डॉलर की अन्य परियोजनाओं पर विचार हो रहा है।

अफगानिस्तान के 35 प्रांतों में अभी 550 छोटी-छोटी परियोजनाएं भारत की मदद से चल रही हैं जो सीधे तौर पर वहां की आवाम के जीवनस्तर को बेहतर बनाने का काम कर रही हैं।

इसके अलावा अफगानिस्तान के प्रशासनिक व सैन्य बलों को बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण का काम भी भारत कर रहा है।

नए माहौल में अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने से भारत की परियोजनाओं पर संशय छा सकता है। 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबान का शासन रहा।

इस दौरान भारतीय हितों को न सिर्फ नुकसान पहुंचाने की हर मुमकिन कोशिश हुई बल्कि भारतीय मदद से निर्मित इमारतों को भी नेस्तनाबूद कर दिया गया था।

तालिबान से भारत की चिंताएं

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