छत्तीसगढ़

विशेष लेख : पं लखनलाल मिश्रा ने 1945 में गांधी के सिपाही बनने छोड़ दी थी पुलिस की नौकरी…

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं लखनलाल मिश्रा के पैतृक ग्राम मूरा, तिल्दा ब्लॉक में झंडारोहण समारोह आयोजित किया गया

  • जब पंडित लखनलाल मिश्रा 1945 में गांधी के सिपाही बनने पुलिस दरोग़ा की नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे।

जानिए कौन है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं लखनलाल मिश्रा

भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement)महात्मा गांधी ने 9 अगस्त 1942 में शुरू किया था तब काफी लोगों ने उनके साथ इस आंदोलन में शिरकत की थी

सन 1945 के दिसंबर माह में गांधीवादी कोंग्रेसी राम कृष्ण पाटिल जी नेतृत्व में नागपुर से दुर्ग पहुँचे थे। रामकृष्ण पाटिल एक पूर्व ICS अधिकारी थे जो 1930 की दशक में दुर्ग के कलेक्टर हुआ करते थे। आज़ादी के बाद वे महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी रहे, उन्हें महाराष्ट्र सरकार का उच्चतम सम्मान महाराष्ट्र भूषण प्राप्त है।

विशेष लेख : पं लखनलाल मिश्रा ने 1945 में गांधी के सिपाही बनने छोड़ दी थी पुलिस की नौकरी...

पाटिल नेतृत्व जब राष्ट्रवादी नेतागण दुर्ग के रेल्वे स्टेशन पर उतरे

पाटिल नेतृत्व जब राष्ट्रवादी नेतागण दुर्ग के रेल्वे स्टेशन पर उतरे तब वहाँ दुर्ग दरोग़ा पंडित लखनलाल मिश्रा को ब्रिटिश सरकार द्वारा कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए दुर्ग स्टेशन भेजा गया था। पुलिस की ज़िम्मेदारी थी की अपने नेताओं को देख लोगों में राष्ट्रवादी भावना जागृत न होने पाए और अराजकता की स्थिति उत्पन्न न हो, इसलिए पंडित लखनलाल मिश्रा की नेतृत्व में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक टीम के साथ दुर्ग रेल्वे स्टेशन पर तैनात किया गया था। लेकिन जब नेता स्टेशन पर उतरे तब पंडित लखनलाल मिश्रा से रहा नहीं गया (उस वक़्त वहा का माहौल बहुत शांत था ) और जो दल राम कृष्णा पाटिल को लेने आया था उस दल में से एक व्यक्ति के हाथ से पंडित लखनलाल मिश्रा ने सूत की माला लेकर खुद रामकृष्ण पाटिल को सलूट कर डाला।

विशेष लेख : पं लखनलाल मिश्रा ने 1945 में गांधी के सिपाही बनने छोड़ दी थी पुलिस की नौकरी...

 

ब्रिटिश पुलिस के दरोग़ा द्वारा duty पर ऐसा कृत्य तत्कालीन सरकार की नज़र बहुत बड़ा दुस्साहस माना गया। सारे लोग जो वहाँ मौजूद थे सन्न रह गए। दरोग़ा पंडित मिश्र यहीं नही रुके, उन्होंने वहाँ भारत माता जय, महात्मा गांधी जय का नारा बुलंद किया। जब महात्मा गांधी ने इसे उस वक़्त के पेपर में पढ़ा तो पंडित लखनलाल मिश्रा के साहस की सहराना की थी। तद्पश्चात मिश्र ब्रिटिश पुलिस की नौकरी त्याग भारत छोड़ो आंदोलन गांधी सिपाही गए।

विशेष लेख : पं लखनलाल मिश्रा ने 1945 में गांधी के सिपाही बनने छोड़ दी थी पुलिस की नौकरी...

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं लखनलाल मिश्रा ने कृषि को पुरे क्षेत्र में बहुत डेवलप किया

पंडित लखनलाल मिश्रा ने उस समय गृहग्राम मूरा और उसके आस पास के गाँव में किसान आंदोलन को आगे बढ़ाया तथा कृषि को पुरे क्षेत्र में बहुत डेवलप किया और कभी भी उसका कोई प्रतिसाद नहीं लिया।

 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं लखनलाल मिश्रा ने नहीं लिया कोई प्रतिसाद

1956 में जब मध्यप्रदेश राज्य बना तब सरकार की तरफ़ से उन्हें चीफ़ विजिलेंस ऑफिसर के पद को सुशोभित करने का अनुरोध भी किया गाया लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। उन्होंने कभी भी प्रतिसाद नहीं लिया, उन्होंने कहा मैंने अपनी मातृभूमि की सेवा की है इसके लिए मैं कोई पुरस्कार या भेंट नहीं लेना चाहता मैंने अपने राष्ट्र के लिए निःस्वार्थ सेवा की है इसके लिए मुझे कुछ नहीं चाहिए।

ग़ौरतलब है कि मिश्र के पुत्र श्री गणेश शंकर मिश्र सूबे के तेज तर्रार आईएएस अधिकारी रह चुके हैं और सरकार के प्रमुख सचिव के पद से सेवानिवृत हुए हैं।

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