छत्तीसगढ़

पत्रकारिता दिवस पर विशेष टिप्पणी, हिंदी अखबार का आज 193 साल पूर्ण

मनीष शर्मा:

मुंगेली: हिंदी अखबार के आज 193 साल पूरे होने जा रहे है, हर वर्ष आज के दिन हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाकर रस्म अदा करते हैं। मालूम हो 193 साल पहले कानपुर से कोलकाता गए किन्हीं पं. जुगल किशोर शुक्ल ने ‘उदंत मार्तंड’ आज के ही दिन हिंदी समाचार अखबार शुरू किया था। यह अखबार बंद क्यों हुआ, उसके बाद के अखबार किस तरह निकले, इन अखबारों की और पत्रकारों की भूमिका जीवन और समाज में क्या थी, इस बातों पर अध्ययन नहीं हुए। आज ऐसे शोधों की जरूरत है, क्योंकि बदलते परिवेश में अब पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण दौर खत्म होने के बाद एक और अतिमहत्वपूर्ण दौर शुरू हो रहा है।

1999 में जब मैंने पत्रकारिता में प्रवेश किया था, तब उस समय मन रुमानियत से भरा था। जेब में पैसा नहीं थे, पर लगता था कि दुनिया की नब्ज पर मेरा हाथ है। देररात के मोटरसाइकिल उठाकर घर जाते समय ऐसा लगता था कि जो जानकारी मुझे है वह हरेक के पास नहीं है। हम दुनिया को शिखर पर बैठकर देख रहे थे। हमसे जो भी मिलता उसे जब पता लगता कि मैं पत्रकार हूं तो वह प्रशंसा-भाव से देखता था। उस दौर में पत्रकार होते ही काफी कम थे। छत्तीसगढ़ राज्य में भी बहुत कम शहरों से अखबार निकलते थे।

राज्यनिर्माण के पहले टीवी पर समाचार के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम पर कुछ ही चैनल ही नजर आते थे। इसके पहले के दौर में समाचार सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले या इंटरवल में फिल्म्स डिवीजन के समाचार वृत्त दिखाए जाते थे, जिनमें महीनों पुरानी घटनाओं की कवरेज होती थी। समाचार पत्रों के लिए कस्बों में कुछ अंशकालिक संवाददाता होते थे, जो प्रायः शहर के वकील, अध्यापक, समाज-सेवी होते थे। वर्तमान में आज उनकी जगह पूर्णकालिक लोग आ गए हैं।

हिंदी पत्रकारिता ने तेजी से कदम बढ़ाए

इक्कीसवीं सदी के प्रवेश द्वार पर आकर किसी ने संजीदगी के साथ भारतीय भाषाओं के अखबारों की खैर-खबर ली। पिछले दो दशक में हिंदी पत्रकारिता ने शहरों से लेकर गांव गांव कस्बों तक काफी तेजी से कदम बढ़ाए। दो दशक पहले मीडिया हाउसों की सम्पदा बढ़ी और पत्रकारों का रसूख भी। नामीगिरामी समूहों के पावरलिस्ट में मीडिया से जुड़े नाम कुछ साल पहले आने लगे थे इस दौरान शुरुआती नाम पहले मालिकों के थे फिर अब एंकरों के नाम जुड़े। अब हिंदी एंकरों को भी जगह मिलने लगी है। पर मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि पत्रकारों को लेकर जिस ‘प्रशंसा-भाव’ का जिक्र मैंने पहले किया है, वह अब के समय मे कम होने लगा है।

ग्रामीण क्षेत्र में अखबार से जुड़े कई काम एक जगह पर जुड़ गए। मार्केटिंग, विज्ञापन, समाचार संकलन और रिसर्च सब कोई एक व्यक्ति या परिवार कर रहा है। समाचार पत्रों के लिए खबर लिखी नहीं एकत्र की जा रही है। एक दौर था जब बस्तर क्षेत्र में कांकेर-जगदलपुर हाइवे पर पड़ने वाले गांव बानपुरी की दुकान के बोर्ड में लिखा होता था- ‘आइए अपनी खबरें यहां जमा कराइए।’ यह विवरण करीब दो दशक पहले का है। आज की स्थितियां और ज्यादा बदल चुकी हैं।

टीवी में चैनलों की बाढ़

लगभग दो दशको में समाचारों के लिए टीवी में चैनलों की बाढ़ सी आ गयी है। आज बदले हालात में जहां इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े ऐसे पत्रकार है, जिन्हें उनका संस्थान वेतन नहीं देता, बल्कि कमाकर लाने का वचन लेता है और बदले में कमीशन देता है। इनसे जुड़े पत्रकार किसी संस्थान से पत्रकारिता की डिग्री लेकर आते हैं। वे अफसोस के साथ पूछते हैं कि हमारे पास विकल्प क्या है? खबरों के कारोबार की कहानियां बड़ी रोचक और अंतर्विरोधों से भरी हैं।

विपरीत परिस्थितियों का सामना करके खबरें भेजने वाले पत्रकार

इनके साथ लोग अलग-अलग वजह से जुड़े हैं। इनमें ऐसे लोग हैं, जो तपस्या की तरह कष्ट सहते हुए खबरों को एकत्र करके भेजते हैं। नक्सली खौफ, सामंतों की नाराजगी, और पुलिस की हिकारत जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना करके खबरें भेजने वाले पत्रकार हैं। और ऐसे भी हैं, जो टैक्सी चलाते हैं, रास्ते में कोई सरकारी मुलाजिम परेशान न करे इसलिए प्रेस का कार्ड जेब में रखते हैं। ऐसे भी हैं जो पत्रकारिता की आड़ में वसूली, ब्लैकमेलिंग और दूसरे अपराधों को चलाते हैं।

यह सही भी है कि अखबारों ने गांवों तक प्रवेश करके लोगों को ताकतवर बनाया, पाठकों के साथ पत्रकार भी ताकतवर बने। पत्रकारों का रसूख बढ़ा है, पर सम्मान कम हुआ है। वह ‘प्रशंसा-भाव’ बढ़ने के बजाय कम क्यों हुआ? अब मोरल पुलिसिंग, खाप पंचायतों, जातीय भेदभावों और साम्प्रदायिक विद्वेष के किस्से हररोज बदस्तूर हैं। इनकी प्रतिरोधी ताकतें भी खड़ी हुई हैं, जो नई पत्रकारिता की देन हैं। लोगों ने मीडिया की ताकत को पहचाना और अपनी ताकत को भी।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

मीडिया और राजनीति के लिहाज से सन 2000 के बाद से गर्द-गुबार से भरे गुजरे हैं। इस दौरान तमाम नए चैनल खुले और बंद हुए, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए लोग मीडिया से उम्मीद करते हैं कि वह जनता की ओर से व्यवस्था से लड़ेगा। पर मीडिया व्यवस्था का हिस्सा है और कारोबार भी। पत्रकारिता औद्योगिक क्रांति की देन है।

पाठक का गहरा भरोसा

एक जमाना था जब पाठकों के लिए अखबार में छपा हर खबर पत्थर की लकीर माना जाता था। पाठक का गहरा भरोसा उस पर था। भरोसे का टूटना अब खराब खबर है। पाठक, दर्शक या श्रोता का इतिहास-बोध, सांस्कृतिक समझ और जीवन दर्शन गढ़ने में हमारी भूमिका है। यह भूमिका जारी रहेगी, क्योंकि लोकतंत्र कभी खत्म नहीं होगा।  

 

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