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ना बोल सकते हैं, ना सुन सकते हैं फिर भी रेस्टोरेंट में बांट रहे हैं खुशियां

जयपुर। राजधानी में एक से एक आलीशान होटल-रेस्टोरेंट हैं। लेकिन इसी शहर में एक ऐसा रेस्त्रां भी है जहां काम कर रहे लोग ना बोल सकते हैं, ना सुन सकते हैं। इसके बाद भी इस रेस्टोरेंट में लोग ना केवल आसानी से खाना खा पाते है ​बल्कि एक खास अहसास लेकर वापस भी जाते है।

हम बात कर रहे हैं जयपुर के लक्ष्मी मंदिर सिनेमा के ठीक सामने बने विट्ठल्स किचन की। यहां काम करने वाले सभी छह नौजवान बोल सुन नहीं सकते हैं लेकिन समझने में बोलने-सुनने वालों से भी दो कदम आगे हैं। मजाल है कि किसी के ऑर्डर में कोई कमी रह जाए।

ये वेटर हैं पढ़े-लिखे
यहां काम करने वाले सभी युवा वेटर ग्रेज्युएट और पोस्ट ग्रेज्युएट हैं। कमांड मिलते ही ये रोबोट की तरह अपने काम को अंजाम देने में जुट जाते हैं। चाय, कॉफी, खाने में मिर्च, नमक की मात्रा से लेकर सबकुछ ये इशारों ही इशारों में पूरा कर देते हैं। मेहमानों की सहूलियत और अदब का ये इतना ख्याल रखते हैं कि गेट पर दस्तक देने के साथ ही आवभगत शुरू कर देते हैं। बड़े अदब के साथ झुकते हुए इशारों में नमस्कार, हाय-हैलो करते हैं। अगर कोई बच्चा साथ में है तो उसकी उंगुली पकड़कर टेबल तक ले जाते हैं। बैठते ही पानी और फिर ऑर्डर के लिए डायरी लेकर खड़े हो जाते हैं।

कुछ ऐसा है मैन्यू कॉर्ड
इनके मैन्यू चार्ट में हर डिश के साथ एक स्पेशल फूड कोड है। इस पर रेट, मात्रा भी है। कोड पर उंगली रखिए या इशारों में समझाइए, ऑर्डर बुक होता चला जाएगा। इस दौरान आप भी इनके सोचने-समझने के अंदाज पर फिदा हो जाएंगे और मानेंगे कि ये किसी से कम नहीं हैं।जब इस रेस्त्रां में लोग पहली बार घुसते हैं तो सारो माहौल देखकर हैरान रह जाते है और जिस तरह से ये दिव्यांग बिना शब्दों के केवल इशारों के जरिये सारा काम बेहतर तरीके से करते है उसे देखकर रोमांचित हो जाते हैं।

इन्हें विश्व की किसी भी भाषा में तकलीफ नहीं
इस रेस्त्रां के डायरेक्टर आशीष बताते हैं कि ये दिव्यांग हमसे कहीं ज्यादा जिम्मेदार और समझदार है। मुझे शुरू में साइन लेग्वेज नहीं आती ​थी लेकिन इन्होंने ही उन्हें ये भी सिखा दिया। ऐसे में अब कोई समस्या आ भी जाती है तो वो लिख कर बता देते हैं। इससे भी खास बात ये है कि अब इस रेस्त्रां में दूसरे देशों के लोग भी आते है। अगर साधारण स्टॉफ होता तो उन्हे इंग्लिश या अन्य भाषा जानने की जरूरत पड़ती लेकिन इनके लिए हर भाषा समान है।

चाहे वो हिंदी हो इंग्लिश या विश्व की कोई भी भाषा समझ इशारों में सबसे आसानी से बात कर लेते हैं। रेस्त्रां में आने वाल इनसे साइन लेंग्वेज में कोई ना कोई शब्द जरूर सीख कर जाता हैं। आशीष कहते हैं कि आज से डेढ़ साल पहले उन्होने ये रेस्त्रां शुरू किया था। लेकिन रेस्त्रां का नाम जम जाने के बाद दो महीने पहले से ही मैने इन दिव्यांगों को काम पर रखा लेकिन इनके आने के बाद से रेस्त्रां पहले से कहीं ज्यादा चलने लगा है। इसके सा​थ ही इनके साथ काम करने से लगता है कि दुनिया में खुशियों की भी कमी नहीं है।

पोद्दार मूक बधिर स्कूल से कर रहे हैं पढ़ाई
यहां काम कर रहे सभी युवा पढ़े-लिखे हैं। पढ़ाई को जारी रखने के लिए ये युवा इस रेस्त्रां में काम भी करते हैं साथ ही वापस जाकर अपनी पढ़ाई में जुट जाते हैं। पश्चिम बंगाल की डेफ अंडर 19 क्रिकेट टीम का प्लेयर विक्की राय भी यहां काम कर चुका है।

विधायक आये तो बोले मेरे यहां भी खुलना चाहिए ऐसा रेस्त्रां

इस रेस्त्रां में खाना खाने के लिए प्रदेश की भादरा विधानसभा के माननीय भी पहुंचे थे। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि इस रेस्त्रां में काम करने वाले बोल सुन नहीं सकते हैं। जैसे ही वो अन्दर आये चौक गये इसके बाद कुछ देर में उनको माजरा समझ में आया लेकिन सर्विस के बाद माननीय बोले अगर ऐसी सोच हो जाये तो दिव्यांगों के लिए चल रही योजनाओं का और भी बेहतर रिजल्ट आयेगा। कोशिश करूंगा की हमारे हनुमानगढ़ में भी ऐसा ही एक रेस्त्रां खुल सके।

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