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गुड्डे-गुड्डियों से नहीं खेलते ये बच्चे,सापों के साथ बड़े होते हैं

आम जीवन में बच्चों के खेलने के लिये गुड्डा गुड़िया खिलौने होते है। वही जोगियों के बच्चों की दुनिया कुछ अलग ही है। सपेरे के बच्चों के बचपन का खिलौना जिन्दा सर्प होते है। इन जिन्दा सर्प को बच्चे अपना खिलौना मानते है। बच्चा जब ज्यादा रोता है तो उसे खेलने के लिये मां भी बच्चों के सामने सर्प को डाल देती है। इन्ही सर्पो के बीच खेल खेल कर बच्चों का बचपना कट जाता है।

चौबेपुर के बसंठी गांव से कुछ दूरी पर सपेरो की बस्ती बसी है। करीब पच्चास सपेरो के परिवार रहते है। नाथ सम्प्रदाय से जुड़ी जोगियों की जाति गांव से दूर अपना डेरा डालती है।इनकी दुनिया चकाचौंध से कोसो दूर है। डेरे के बच्चों की दुनिया उनका डेरा ही होती है। कुछ बड़े हुये तो पिता भाई के साथ जंगलों में सर्प पकड़ने में जुट जाते है। इन बच्चों को तो यह भी नही पता कि खिलौने क्या होते है। रंग बिरंगे खिलौने टैडी वियर, बाजा, झुनझुना इन बच्चों को नही पता है।

जोगियों के बच्चों का तो खिलौना जिन्दा सर्प है। काले सर्प से लेकर बच्चों के लिये छोटे बड़े सभी सर्प ही खेलने का एक मात्र साधन है। बच्चा जब रोता है तो उसे आम तौर पर खिलौने देकर चुप कराया जाता है। पर जोगी डेरा में बच्चा रोता है तो उसे खेलने के लिये सर्प दे दिया जाता है। सर्पो के साथ खेलने में कटा बचपन किशोर अवस्था में आते आते सर्प पकड़ने में लग जाता है। डेरे में देखा गया तो तमाम बच्चे जिनके तन पर कपड़े भी नही थे। वह तिरपाल की डेरे में बैठ कर सर्पो के साथ खेल रहे थे। डेरे पर मिले जाबड़ी नाथ कहते ही बच्चों के लिये खिलौन कहा से लाया जाय।इतनी कमाई नही होती है।

बच्चे के जन्म पर ढोलक नहीं बीन बजती है
सपेरो की बस्ती में जब किसी के घर बच्चा जन्म लेता है। तो डेरे पर ढोलक नही बजती है। परम्परा के अनुसार इनकी बस्ती में बीन बजाकर ही जश्न मनाया जाता है। बीन की धुन पर साप को नचाते है। कहते है डेरे पर भगवान शंकर की कृपा रहती है। तो भगवान शंकर को खुश करने के लिये बीन बजाई जाती है।

सोवर में बच्चे के पास रखा जाता है सांप
डेरे में बच्चा के जन्म लेते ही उसके पास एक सर्प रखा जाता है। जिससे माना जाता है कि बच्चा डरता नही है। चारपाई के पास ही सर्प की पिटारी को रखा जाता है। छठी के दिन बच्चे के हाथों से सर्प छुआया जाता है। साथ ही बीन भी हाथों में दी जाती है।

सात वर्ष की उम्र में बच्चों को बीन बजाना सिखाया जाता है

जोगी का लड़का जैसे ही सात वर्ष की उम्र में अपना पैर रखता है। उसे बीन बजाने की कला को सिखाना शुरु कर दिया जाता है। पांच साल तक उसे बीन बजाना व उसमें धुन निकालने की कला सिखाई जाती है। बीन में सुरो का ज्ञान कराया जाता है। बीन के साथ सर्प को कैसे नचाते है वह भी बताया जाता है। एक डेरे पर देखा तो बुधवा नाथ अपने बच्चे को सर्प के सामने बीन बजाना सिखा रहा था।

इसके बाद बारह साल की उम्र से लड़के को साप पकड़ने की कला सिखाई जाती है। कुछ दिन तो वह जंगलों में जाकर साप को पकड़ना देखता है। पहले उसे छोटे छोटे साप पकड़ना बताया जाता है। इसके बाद बड़े व काले सर्प को कैसे पकड़ते है बताते है। जमीन में गड्ढो में कैसे साप होने का अनुमान लगाते है। कैसे खोद कर पकड़ते है।

सावन का महीना होता है खास
सपेरे के लिये सावन का महीना खास होता है। सावन के महीने में सर्प को बस्ती बजारों मेले मन्दिरों के पास पोटली में रखते है। पिटारी में रखे साप को दिखाते है। सावन के महीने में भक्त साप का देखना शुभ मानते है। इसके लिये इनकों काफी कमाई हो जाती है। सावन से पहले बरसात में जंगलों में सपेरे ज्यादातर काले सर्प पकड़ते है।

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