अंधविश्‍वास : ग्रामीण क्षेत्रों और आदिवासी अंचलों में अंधविश्‍वास की हदे पार

मप्र के आदिवासी अंचल खालवा के वनग्राम सुंदरदेव में एक महिला को घर पर प्रसव हुआ। नवजात के हाथों में पांच की जगह छह-छह अंगुलियां थी।

आधुनिकता के तमाम दावों के बीच देश में अंधविश्‍वास आज अभी भी अपनी गहरी जड़ें जमाए हुए है। ग्रामीण क्षेत्रों और आदिवासी अंचलों में अंधविश्‍वास कई बार हदें पार कर देता है।

पिछले दो दिन में लगातार दो ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें ढकोसलों के चलते परिवार के लोग अपने ही मासूम बच्‍चों के दुश्‍मन बन गए।

पहली घटना मध्‍यप्रदेश के खंडवा की है जहां छह अंगुलियों के साथ जन्‍मे नवजात की अंगुलियों घरवालों ने अनिष्‍ट की आंशका के चलते घर पर ही काट दीं, जिससे उसकी मौत हो गई।

दूसरी घटना झारखंड से रांची की है जहां एक नवजात बेटे को ज्‍योतिष द्वारा अशुभ बताए जाने पर घरवाले उसे अनाथआश्रम लेकर पहुंच गए और बदले में बेटी की मांग करने लगे। उनकी यह मांग खारिज कर दी गई। पढि़ये घटनाक्रम विस्‍तार से।

मप्र के आदिवासी अंचल खालवा के वनग्राम सुंदरदेव में एक महिला को घर पर प्रसव हुआ। नवजात के हाथों में पांच की जगह छह-छह अंगुलियां थी।

अंधविश्वासी और अशिक्षित परिजन ने नवजात के हाथ की एक-एक अंगुली घर पर ही काट दी। इसके कुछ देर बाद ही नवजात की मौत हो गई।

लगभग एक सप्ताह बाद नवजात की मौत पर से रहस्य उठा तो स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई की खानापूर्ति शुरू कर दी।

स्वास्थ्य विभाग ने अपनी लापरवाही छिपाने के लिए एक पंचनामा बनाकर और कर्मचारियों को नोटिस देकर अपनी जिम्मेदारी निभा ली है।

करीब एक सप्ताह पूर्व शुक्रवार-शनिवार की रात्रि में ग्राम सुंदरदेव के रामदेव पिता छोग्या की पत्नी को प्रसव पीड़ा हुई।

ग्राम में मोबाइल नेटवर्क के अभाव में जननी एक्सप्रेस को सूचना नहीं दी जा सकी। घर में ही प्रसव हुआ और कुछ देर बाद शिशु की मौत हो गई।

स्वास्थ्य विभाग अब परिजनों की लापरवाही बता रहा है जबकिग्राम में ही प्रसव केंद्र स्थापित है।

महिला के गर्भवती होने से लेकर प्रसव तक की समय-सीमा में स्वास्थ्य विभाग की आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम सहित अन्य अमला महिला को संस्थागत प्रसव कराने के लिए जिम्मेदार होता है।

रांची : “मनहूसियत” का दंश झेलता शिशु

झारखंड में अंधविश्वास का बड़ा ही अजीब मामला सामने आया है। ज्योतिषी ने एक कपल से कह दिया कि उसका नवजात बेटा उनके लिए अशुभ है

तो उसके बाद वे अपने बेटे के बदले एक बच्ची लेने के लिए बाल कल्याण समिति (CWC) पहुंच गए।

वे चाहते थे कि उनके ‘मनहूस’ लड़के के बदले में कोई अनाथालय उन्हें लड़की दे दें। लेकिन सीडब्ल्यूसी ने उनका यह आवेदन खारिज कर दिया।

सीडब्ल्यूसी ने उनकी इस संबंध में काउंसलिंग की लेकिन फिर भी वे बेटा अपने पास रखने के लिए तैयार नहीं हुए और उसके बदले में एक बच्ची की इच्छा कर रहे थे।

उन्होंने एक नहीं मानी और अपने बच्चे को अनाथालय में छोड़ दिया। सीडब्ल्यूसी ने बच्चे को अंधविश्वासी परिवार के पास बच्चा रहने देने की बजाए उसे अपनी केयर में ले लिया।

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