सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों की मनमानी पर कहा गैरजरूरी मेडिकल जांच आपराधिक कृत्य

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों की मनमानी पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए गलत रिपोर्ट और गैरजरूरी जांच को आपराधिक कृत्य बताया है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें सोचना चाहिए कि क्या कर रहे हैं। क्या यह आपराधिक कृत्य नहीं है। सिर्फ इसलिए कि उन पर कार्रवाई नहीं की जाती है, तो क्या वे जिम्मेदारी से बच सकते हैं। समय आ गया है कि जिम्मेदारी तय हो और दोषियों को सजा मिले, जिन्होंने प्रणाली को सड़ा दिया है।

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने सोमवार को एक फैसले में कहा कि आजकल अस्पतालों में फाइव स्टार सुविधाएं दी जा रही हैं। इलाज की पूरी अवधारणा फायदा कमाने पर केंद्रित हो गई है। ये सुविधाएं वहन करना तक मुश्किल हो गया है। कई बार खर्च बहुत ज्यादा होता है और जो सुविधाएं दी गई हैं, उनसे कहीं ज्यादा पैसा वसूला जाता है।

अदालत ने निजी अस्पतालों को जमीन के बदले गरीबों के मुफ्त इलाज के मामले में दिए 124 पन्नों के विस्तृत फैसले में यह भी कहा कि दिल्ली, गुडगांव और आसपास के तमाम बड़े अस्पतालों के लिए यह आत्मविवेचना का समय है जो गलत रिपोर्ट तैयार कराने और अनावश्यक मेडिकल जांच से भी गुरेज नहीं करते हैं। यहां तक कि दिल की अंदरुनी और बाहरी जांच कराने के दौरान भी यही रवैया रहता है।

चिकित्सा का पेशा कमाई का धंधा बना : अदालत ने फैसले में लिखा है, मेडिकल प्रोफेशन कभी भी शोषण का तरीका और पैसा कमाने का धंधा नहीं माना गया था, क्योंकि डॉक्टर को भगवान माना जाता है। हर पर्ची आरएक्स अक्षरों से शुरू होती है, जिसका मतलब खर्च का बिल कतई नहीं है। पीठ ने कहा दिल्ली या आसपास में बड़े अंतरराष्ट्रीय अस्पताल होने का मलतब यह नहीं है कि वे नैतिक आदर्शों से ऊपर हैं, जो उन्हें हर कीमत पर बनाए रखना है चाहे इसके लिए गरीबों को आर्थिक मदद भी क्यों न देनी पड़े। ये अस्पताल अपने इस अंधेरे पक्ष को समाज के गरीब वर्ग का मुफ्त इलाज कर उजला कर सकते हैं। धन के अभाव के आधार पर किसी का इलाज से मना करना लगभग अमानवीय है।

दिल्ली सरकार से रिपोर्ट तलब : सरकार के गरीबों के मुफ्त इलाज करने के परिपत्र को सही ठहराते हुए पीठ ने कहा कि जब सरकारी भूमि धर्मार्थ उद्देश्य के लिए अस्पताल चलाने के वास्ते ली गई थी, तो सरकार को इस शर्त को लागू करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि मुफ्त इलाज की यह शर्त संविधान के अनुच्छेद 19(6) और 19(1)(जी) (देश में कहीं भी व्यावसाय का अधिकार) का उल्लंघन नहीं करती। अदालत ने कहा, अस्पतालों के विरोध को देखते हुए दिल्ली सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह मुफ्त इलाज की शर्तों के पालन करने के बारे में अस्पतालों की वाषिर्क रिपोर्ट कोर्ट में दायर करे।

शव न देने पर केस दर्ज हो : अदालत ने कहा, यहां तक कि मृत व्यक्ति का शव तब तक नहीं दिया जाता जब तक उसके परिजनों से इलाज की पूरी रकम नहीं वसूल ली जाए। यह अपने आप में गैरकानूनी है। भविष्य में जब भी ऐसा कोई मामला आए, तो पुलिस को अस्पताल के प्रबंधन और संबद्ध डॉक्टरों के खिलाफ इस अमानवीय कृत्य के लिए मुकदमा दर्ज करना चाहिए। यह मानवीय गरिमा के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लघंन करता है, जो मेडिकल व्यावसाय पर किए गए विश्वास का हनन है। पीठ ने कहा कि डॉक्टर बनाने के लिए सरकार भारी धन इसलिए खर्च करती है, ताकि वे बाद में ऐसे जरूरतमंदों का इलाज करें, जो भारी खर्च नहीं उठा सकते।

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