विचारसंपादकीय

अन्यथा : सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संख्याबल की राजनीति

अनिल विभाकर

संख्याबल और जातिबल की राजनीति से देश पर संकट के विनाशकारी बादल छा गए हैं. अगर यह इसी तरह जारी रही तो देश की स्थिति उस खूबसूरत पतंग जैसी हो जाएगी जो शरारती बच्चों की छीन-झपट में किसी काम की नहीं रह जाती है. इस छीन -झपट में पतंग का क्या हाल होता है यह बताने की जरूरत नहीं. पतंग का कोई न कोई टुकड़ा इस छीन-झपट में शामिल हर बच्चे के हाथ में होता है और वह किसी काम का नहीं रह जाता. पतंग लूटने वाले बच्चे तो अनुभवहीन और अबोध होते हैं मगर देश में ऐसी राजनीति करने वाले अबोध नहीं चतुर हैं. पिछले सत्तर साल में स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते अब इस हाल में पहुंच गई कि जाति के संख्याबल की ताकत के नशे में चूर देश का दलित और पिछड़ा वर्ग सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध खड़ा होकर विद्रोह का बिगुल फूंकने से भी बाज नहीं आ रहा.

दलित -जनजाति उत्पीड़न निषेध कानून के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विरुद्ध भारत बंद विद्रोह नहीं तो और क्या था? अदालत के फैसले के खिलाफ इसी तरह बंद का आयोजन कर न्यायपालिका पर जातिबल का दबाव डालने की घृणित राजनीति होगी तो अदालतों से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जाएगी. तब तो न्यायपालिका जाति और संख्याबल को ध्यान में रखकर फैसला करने लगेगी और उचित -अनुचित का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने दलित -जनजाति उत्पीड़न निषेध कानून को समाप्त नहीं किया , केवल उसके मानवाधिकार और संविधान विरोधी प्रावधानों को निरस्त किया जो संख्याबल और जातिबल की राजनीति के लिए लागू किए गए थे. दलितों की राजनीति करने वाली मायावती जब 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने भी इस कानून के व्यापक दुरुपयोग को रोकने के लिए इसी तरह के दो आदेश जारी किए थे जो वहां अब भी लागू हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ज्यादती से परेशान महाराष्ट्र के एक व्यक्ति की अपील की सुनवाई करते हुए जब मायावती सरकार के आदेश जैसा ही निर्देश दिया तो आश्चर्य है खुद बसपा सुप्रीमो समेत सत्ता से बाहर सभी विपक्षी दल देश भर में सड़कों पर उतर कर आगजनी और तोड़फोड़ करने लगे.

सुप्रीम कोर्ट यदि जाति के संख्याबल को ध्यान में रखकर फैसले देने लगा तब तो वैसे लोगों को कभी न्याय ही नहीं मिलेगा जिनकी जाति की संख्या कम है. कहने की जरूरत नहीं कि इस समय देश में कथित सवर्ण जाति के लोगों की संख्या सबसे कम है. इस वर्ग के लोगों की संख्या उससे भी कम है जिन्हें सरकार और संविधान ने अल्पसंख्यक का दर्जा दे रखा है. जाति और संख्याबल की इस घृणित राजनीति का ही नतीजा है कि देश में जिस जाति के लोग संख्याबल में कम हैं वे निरंतर सत्ता से भी बाहर होते जा रहे हैं और उत्कृष्ट प्रतिभा और योग्यता होने के बावजूद सरकारी सेवाओं से भी. योग्यता और प्रतिभा का तिरस्कार आखिर देश और समाज को किस स्थिति में पहुंचा देगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. बाबा साहब अंबेदकर इस नीति के प्रबल विरोधी थे. वे संविधान में आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ थे.मगर उन्हें अपना प्रेरणापुरुष मानने वाले दल उनकी नीति और भावना के विरुद्ध दलितों और पिछड़े वर्ग के हित के नाम पर देश और समाज में जहर घोल रहे हैं. ऐसा वे दलितों और पिछड़े वर्ग के हित के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपनी सत्ता और दबंगई बनाए रखने के लिए कर रहे हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो आजादी के इन सत्तर सालों में दलितों की हालत काफी सुधर चुकी होती.

आरक्षण से सिर्फ इतना ही हुआ है कि दलितों और पिछड़ों की दो-चार दबंग जातियां विपन्न और जरूरतमंद दलितों और पिछड़ों की सुविधाएं हड़प कर दबंग बन गर्इं हैं. दरअसल इस समय वे ही असली सवर्ण हैं और अगड़ी जातियों को उल्टे वे बदनाम कर रही हैं. वे अपनी जाति के अन्य जरूरतमंद पिछड़ों और दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं उठाने देना चाहतीं. इसलिए आरक्षण खत्म किए जाने की अफवाह उड़ा रही हैं. इसके पीछे सिर्फ सत्ता में काबिज होना उनका मकसद है, दलितों और पिछड़ों का हित बिल्कुल नहीं. यही है संख्याबल और जाति की राजनीति. यह राजनीति इस कदर विखंडनवादी हो गई है कि फिल्म अ•िानेता सलमान खान को अपराध के लिए सजा मिलने पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री तक ने खुलेआम यह कह दिया कि भारत में मुसलमानों को अदालत से न्याय नहीं मिलता. वहां फैसला देने में भेदभाव किया जाता है.

पाकिस्तानी विदेशमंत्री के इस बयान के समर्थन में देश के भी कुछ मुस्लिम नेता उतर आए और टेलीविजन चैनलों पर चीख-चीख कर इस फैसले को अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय बताने लगे. शाहबानो मामले में भी लगभग यही हुआ जिसके कारण तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने संविधान में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के फै सले को ही निरस्त कर दिया था. इसी तरह की राजनीति बिहार के चारा घोटाले में लालू यादव को अदालत से दोषी साबित होने पर की जा रही है. कहा जा रहा है कि लालू पिछड़ी जाति के नेता हैं इसलिए केंद्र की भाजपा सरकार ने एक साजिश के तहत फंसा कर उन्हें जेल में डाल दिया.

जबकि हकीकत यह है कि बिहार का चारा घोटाला जब उजागर हुआ था उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राज्य में खुद लालू की पार्टी की. सत्ता और राजनीतिक तिकड़म से लालू ने इस मामले को दो दशक तक लटकाए रखा और राजनीति करते रहे.अब जाकर फैसला आया है तो वे और उनके समर्थक जाति के संख्याबल की राजनीति कर देश भर में इसके लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम कर रहे हैं. अफजल गुरु और याकुब मेनन की फांसी पर भी धर्मनिरपेक्षता,अल्पसंख्यक और जाति की राजनीति करने वाले पूरे देश में इसी तरह अदालत के निर्णय का विरोध कर रहे थे. याद रहे याकुब मेमन की फांसी से पहले कुछ एक्टविस्ट वकीलों ने इतिहास में पहली बार मध्यरात्रि में सर्वोच्च न्यायालय की अदालत तक लगवाई थी.अगर ऐसी ही राजनीति होती रही तो देश और संविधान का क्या होगा? फिर तो जाति और संख्याबल की राजनीति विनाशकारी बन जाएगी और बेकसूर हमेशा कसूरवार बताकर प्रताड़ित किए जाते रहेंगे.

आजादी के बाद बाबा साहब अंबेदकर ने जो संविधान देश को दिया उसमें अब तक लगभग सवा सौ संशोधन हो चुके हैं. इनमें सबसे अधिकतर संशोधन कांग्रेस की सरकारों ने किए. इन संशोधनों के पीछे कांग्रेस का मकसद सिर्फ अपना वोट बैंक बनाना था , उस दलित और पिछड़े वर्ग का हित नहीं जिसकी वह इस समय हिमायत कर रही है.ऐसा करते वक्त कांग्रेस की सरकारों ने यह सोचा ही नहीं कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे और ऐसे अनैतिक व अमानवीय संशोधनों से देश का क्या हाल होगा. कांग्रेस की सरकारों ने समाज को बांटने के लिए लोगों में जातिवाद का जहर फैलाकर अगड़ों,पिछड़ों और दलितों को आपस में लड़ाया. अल्पसंख्यक और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच में कटुता पैदा की. कानून में ऐसी व्यवस्था की ही नहीं कि दलितों और पिछड़ों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ जरूरतमंद लोगों को मिले. नतीजा यह हुआ कि दलितों और पिछड़ों में दो-चार दबंग और संपन्न जातियां आरक्षण का लाभ उठाती रहीं और उस वर्ग के जरूरतमंद लोग इससे वंचित रह गए. कांग्रेस इस समय अपनी करनी से सरकार से बाहर है तो उसके अध्यक्ष राहुल गांधी कह रहे हैं कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने दलितों-पिछड़ों का आरक्षण खत्म कर दिया.

क्या एक ऐतिहासिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह बयान विध्वंसकारी नहीं है? देश में दलितों-पिछड़ों को मिला आरक्षण सचमुच खत्म कर दिया गया है? ऐसे नेता के हाथ में देश की बागडोर सौंपी जा सकती है क्या? सत्ता में आने के लिए झठ और अफवाह फैलाकर सरकार और सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ लोगों को भड़काना और सड़क पर उपद्रव कराना न तो देश के लिए ठीक है और न ही समाज के लिए. विस्मय की बात यह है कि जो काम अब सुप्रीम कोर्ट ने किया 2007 में वही काम करने वाली मायावती और उनके समर्थक दल इस समय कांग्रेस के साथ खड़े हैं.

अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न विरोधी कानून के नाम पर कांग्रेस की सरकार ने जो कानून बनाया था उसके कुछ प्रावधान संविधान और मानवाधिकार के विरुद्ध थे. सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं गैरकानूनी प्रावधानों पर गौर करते हुए सिर्फ इतना कहा कि दलित उत्पीड़न के मामले में बिना छानबीन और सबूत के तत्काल किसी की गिरफ्तारी न की जाए. गिरफ्तारी से पहले डीएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी से पर्यवेक्षण कराकर एसएसपी से निर्देश लेना जरूरी है.यह प्रक्रिया एक सप्ताह में पूरी कर ली जाए. दरअसल दलित और जानजाति उत्पीड़न के नाम पर दर्ज सत्तर फीसदी से भी अधिक मामले जांच में फर्जी पाए गए. अधिकतर मामले भयादोहन के लिए दर्ज कराए गए थे.

दलित या जनजाति उत्पीड़न के मामले दर्ज होते ही पुलिस कथित आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेज देती थी जिन्हें जमानत के लिए हाईकोर्ट का चक्कर लगाना पड़ता था.इस प्रक्रिया में आरोपी बिना किसी गुनाह के महीनों जेल में बंद रहता था. सवाल है संविधान देश के हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है मगर जो नागरिक दलित और जनजाति का नहीं , उसे समानता का मौलिक अधिकार है या नहीं? इस दलित-जनजाति उत्पीड़न निषेध कानून से तो अन्य वर्गों के मौलिक अधिकार और मानवाधिकार का भी हनन होता था. इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इन सब बातों पर गौर करते हुए यह निर्णय दिया है जिसका सम्मान होना चाहिए.

जातिबल के दबाव में केंद्र सरकार ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है. देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या फैसला देती है. दलितों ,पिछड़ों और जानजाति के लोगों को यह समझना चाहिए कि बसपा की मंशा उनका जीवन सुधारना नहीं बल्कि मायावती की सरकार बनाना है ताकि वह नोटों की माला पहन सकें और सपा का मकसद अखिलेश यादव की ताजपोशी है. राजद का मकसद है लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाना और कांग्रेस का उद्देश्य प्रधानमंत्री की कुर्सी पर राहुल गांधी की ताजपोशी करना है. बस इसी के लिए ये सभी नेता और पार्टियां देश और समाज में अराजकता उत्पन्न करने में लगी हैं.इन नेताओं और दलों को न तो संविधान की चिंता है और न देश की.

Tags

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.