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भारतीय जेलों में हर वर्ष मर रहे हैं 100 से अधिक कैदी, सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

जेल में कैदियों के मरने की संख्या लगातार बढ़ रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स के आंकड़ों पर नजर डालें तो महज चार सालों में करीब 500 से ज्यादा कैदियों की मौत जेल में सजा काटने के दौरान हो गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो का हवाला देते हुए कहा है कि भारतीय जेलों में कैदियों की अप्राकृतिक मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है, रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि भारतीय जेलों में हर वर्ष 100 से अधिक कैदियों की मौत हो रही है और ये चिंता का विषय है।

वर्ष 2012 में जेल में 127 मौतें हुईं है जिसमें 87 कैदियों ने आत्महत्या की, जबकि 2013 में 114 (70) ,2014 में 194 में 94 और 2015 में 114 में 77 कैदियों ने आत्महत्या की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है सामान्य जेलों में मरने वालों की तुलना में जेलों में आत्महत्या करने वालों का आंकड़ा 50 फीसदी अधिक है।

जेलों में लगातार हो रही कैदियों की मौतों और आत्महत्या के मामले को संजीदगी से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश मदन बी लोकूर और दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा है कि हमारी जेलों में कैदियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है। क्या यह प्रतिशोध और प्रतिरोध का सिद्धांत है? जबकि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली कैदियों के सुधार और पुनर्वास पर विश्वास करती है।

जेलों में कैदियों की बढ़ती मौतों को संजीदगी से लेते हुए न्यायमूर्ति लोकूर ने अपने फैसले में लिखा- जेल के अधिकारियों ने आपराधिक न्याय प्रणाली और पुनर्वास नीति को सिरे से खारिज कर दिया है जिसके कारण जेलों में हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं और अप्राकृतिक मौतें हो रही हैं।

पीठ ने राज्य सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कैदियों को बेहतर सुविधाएं देने से कोई भी राज्य सरकार बच नहीं सकती है। कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से राज्यो से संबंधित अधिकारियों के साथ चर्चा करने और जेलों में आत्महत्या करने वालों कैदियों के बच्चों की संख्या 31 दिसंबर तक निर्धारित करने को कहा है।

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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स
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