रोजमर्रा के छोटे-छोटे क्रियाकलापों से प्रतिभा को उजागर किया जा सकता है- हेमंत खुटे

संडे की पाठशाला, हौसले की पाठशाला ,शतरंज की पाठशाला एक संयुक्त प्रयास

– मनराखन ठाकुर

पिथौरा: सतनाम तपोभूमि गिरौदपुरी धाम के समीपस्थ गांव बैजनाथ रहवासी सामान्य कृषक मुखिया मालिक राम खुटे के परिवार में जन्म लेकर बीहड़ वनांचल गांवों की खूबसूरत हरियाली से भरपूर बारनवापारा अभयारण्य के शासकीय प्राथमिक शाला में शिक्षा दीक्षा हासिल कर अपने दैनिक दिनचर्या के छोटे-छोटे क्रियाकलापों के माध्यम से अपनी प्रतिभा को उजागर कर अन्य लोगों में भी अन्य लोगों को भी खुद की प्रतिभा को पहचानने और आंकलन कर उसके अनुरूप कार्यों को पूरा कर सार्वजनिक मंचों से संपर्क स्थापित कर अपने हुनर को प्रदर्शित करने का सिलसिला जारी रखने वाले यह शख्स आज किसी परिचय के मोहताज नहीं नहीं नहीं है चाहे वो संडे की पाठशाला हो या दिव्यांग स्कूली बच्चों की गतिविधियों पर आधारित हौसले की पाठशाला हो अथवा शतरंज की पाठशाला हो बाकायदा इसका संचालन कर उन्हें व्यवहारिक रुप मे दक्ष, निपुण और मजबूत बना रहे हैं जो बच्चों के बीच हेमन्त सर के नाम से लोकप्रिय और चर्चित है।

गांव की माटी ,फूलों की हरियाली की खुशबू बऔर अपनी आंतरिक प्रेरणा के माध्यम से सामान्य जीवन की रोजमर्रा के छोटे-छोटे क्रियाकलापों को ज्ञान वर्धन विषय वस्तु के रूप में चयन कर उसे एक विधा के रूप में प्रस्तुत कर नवाचार शिक्षा पहल के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया है।

प्रतिभा जन्मजात होती है और प्रत्येक व्यक्ति में प्रतिभा स्वयं के अंदर समाहित होती है । छात्र जीवन की रुचि, इच्छा- शक्ति ही प्रेरणा पुंज के रूप में कार्य करती है। हायर सेकेंडरी शिक्षा के दौरान मध्यप्रदेश विज्ञान सभा से इन्हें जुड़ने का अवसर मिला। विज्ञान सभा द्वारा आयोजित विभिन्न क्रियाकलापों में सतत भागीदारी होने के कारण ज्ञान एवं अनुभव का विस्तार होता गया और पेशे से शिक्षक होने के कारण इसका प्रायोगिक उपयोग अपनी पाठशाला से प्रारंभ कर शिक्षा क्रांति के रूप में एक नया अध्याय के सूत्रपात किया जिसे लोग संडे की पाठशाला के नाम से जानते हैं। इसके तहत ए से लेकर जेड तक सह संज्ञानात्मक गतिविधियों पर आधारित रोचक कार्यक्रम आयोजित होता है जिसमे तर्क, बुद्धि एवं मानसिक क्षमता का विकास शामिल है ।

बच्चों के व्यक्तित्व निखारने के लिए खेल गतिविधियों का समावेश कर शारीरिक तंदुरुस्ती एवं मानसिक ताजगी के लिए शतरंज की पाठशाला का अभिनव प्रयोग की शुरुआत की । इसका नतीजा यह हुआ कि स्कूल स्तर पर ही ग्रामीण अंचल के जिज्ञासु विद्यार्थियों ने रुचि लेकर इसमें भाग लेना शुरू किया। आज ग्रामीण अंचल में जितनी भी शतरंज की टूर्नामेंट होती है इसके प्रतिभागी शतरंज की पाठशाला के स्टूडेंट ही होते है। पिथौरा ब्लॉक के कसहीबाहरा, लाखागढ़, सोनासिल्ली, जगदीशपुर ,परसवानी, अरंड, सांकरा आदि गांव से अनेक होनहार खिलाड़ियों का उदय हुआ । इसके अतिरिक्त महासमुन्द ब्लॉक के ढांक व महासमुन्द के विद्यार्थी भी लाभान्वित हुए है।आज महासमुन्द जिला शतरंज के खेल में अग्रणी बना हुआ है इसका पूरा श्रेय शतरंज की पाठशाला को जाता है।उल्लेखनीय है कि शिक्षक हेमन्त खुटे शतरंज के राष्ट्रीय निर्णायक एवं कोच भी है ।उन्होंने अब तक 3000 से भी अधिक लोगो को शतरंज का निःशुल्क प्रशिक्षण दिया है।

दिव्यांग बच्चों के सशक्तिकरण एवं विभिन्न गतिविधियों के लिए अभिप्रेरित करने के उद्देश्य से साप्ताहिक रविवार के दिन हौसले की पाठशाला के नाम से एक नई पहल की शुरुआत इनके द्वारा की गई है जिसमें दिव्यांग स्कूली बच्चों को शिक्षा पाठ्यक्रम के अलावा उनके शारीरिक और मानसिक स्थिति को मद्देनजर रखते हुए उनकी रुचि के अनुरूप कार्य योजना तैयार कर अनुकूल माहौल का निर्माण किया है। हौसले की पाठशाला कि दिव्यांग छात्र यामिनी यादव ,भूपेंद्र पटेल, राजाराम यादव ने अटल नगर (नया रायपुर )में आयोजित खेल प्रतियोगिता में शामिल होकर इस पाठशाला के नाम को रोशन किया है। एक साथ तीन संयुक्त प्रयास का परिणाम यह निकला की सभी बच्चों को अपनी प्रतिभा को निखारने के लिए एक उपयुक्त मंच मिल गया।

हमारे प्रतिनिधी से चर्चा के दौरान हेमंत ने बताया कि वे संडे की पाठशाला के संचालन का सफलतापूर्वक शानदार 5 साल तथा हौसले की पाठशाला व शतरंज की पाठशाला का 1-1 वर्ष पूर्ण कर चुके है। अगामी शिक्षण सत्र में बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए एक आधारभूत सरचना का ढांचा तैयार किया है जिसमें समग्र शिक्षा के तहत खेलकूद को प्राथमिकता दी जाएगी।बच्चों को वाकपटुता, लेखन नृत्य गायन ,संगीत को लेकर एक वृहद कार्य योजना बनाई गई है जिसमें सभी प्रशिक्षित एवं अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त होगा। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हेमन्त खुटे का मानना है कि व्यक्ति के अंदर छुपी हुई प्रतिभा को पहचानना और उन्हें सही मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन देना उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य है। और उसी लक्ष्य को लेकर निरंतर आगे बढ़ रहे हैं ।बहरहाल लाखागढ़ सरीखे ग्रामीण अंचल से उभरी हुई एक प्रतिभा निःशुल्क सेवा देकर समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गया है।

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