सत्कर्म कार्य करने का आधार ही श्रेष्ठ बनना है : आचार्य शास्त्री

अमृत लाल साहू

भाटापारा।

सुभाष वार्ड लखनलाल शर्मा कालोनी में स्व. महेश प्रसाद तिवारी के वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर श्रीमद् भागवत् सप्ताह ज्ञान यज्ञ का तीसरे दिन की कथा में प्रवचनकर्ता पं. आचार्य राजेन्द्र प्रसाद शास्त्री ने अपने व्याख्यान में कहा कि भगवान को अपना मान लो या भगवान आपको अपना मान ले तो अहंकार सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

कर्म के आधार से पूर्व पश्चिम उत्तर दिशा से आत्मा विमान में सवार होकर जाते हैं। जो दक्षिण दिशा से जाते हैं वे नरक को जाते हैं। प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्य का ध्यान जरूर रखना चाहिए क्योंकि कर्तव्य करते रहने से सबकुछ प्राप्त हो जाता है.

कथा को आगे बढाते हुए आचार्य जी ने बताते हुए कहा आज संसार में जितने लोग पूजा पाठ करते हैं और सच्चाई के मार्ग का अनुकरण करते है वे वास्तव में तकलीफ में रहते हैं यह कलयुग ये पल उन ब्यक्तियों के लिए परीक्षा की घडी होती है एक पुत्र धर्म के पालना करने वाले होते है तो उसकी 21 पीढी तर जाते हैं।

जीवन का वास्तविक अर्थ धर्म करते करते ही प्राण को त्यागना चाहिए जो व्यक्ति सतकर्म कार्य करते रहते हैं वे श्रेष्ठ बन जाते हैं कष्ठ पाने पर भी धर्म को नही त्यागना चाहिए पृथ्वी का रूप गौ है और धर्म का स्वरूप बैल है.

वर्तमान कलयुग में धर्म का एक पैर रह गए हैं। तीन पैर नही है वे क्रमशः सत्य सोच और दया नही रह गया है। जबकि दया धर्म की मूल है कलयुग का वर्णन करते हुए उन्होने बताया कलयुग के समान कोई युग नही है क्योंकि एक बार भगवान का नाम लेने वाला भी स्वर्ग में चला जाता है साथ ही भगवत कथा सुनने वाले बुरे कर्म से बचे रहते है।

सही कमाई करने वाले पर कलयुग का प्रभाव आसानी से नही पडता आज संस्कृत अर्थात देववाणी को भूलते जा रहे हैं यह एक विडम्बना है कलयुग का अर्थ बताते हुए कहा कि कलयुग का काम ही विरोध कराने का काम कराता है अतिथि को पहले पानी दीजिए फिर वाणी से स्वागत कीजिए यह नियम कहता है अगर कोई अपमान करे तो उसका अपमान करने के बजाए उसके गले मे माला पहना देने से उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। कभी भी गलत कार्य करने के बाद पश्चाताप करना चाहिए जो इस प्रकार के कार्य करते है.

वही परीक्षित बन जाते हैं। त्याग की प्रवृति जीवन में जरूरी है अपने जीवन को सुधारने से आप महान बन जायेंगे। आज भी भक्ति के द्वारा बहुत कुछ शक्ति की प्राप्ति होती है वक्ता श्रोता को ऐसा कथा सुनाए कि श्रोता का भय दूर हो जाए ऐसा वक्ता और श्रोता का संबंध होना चाहिए जीवन का सही अर्थ बताते हुए कहा कि जीते जी भगवान को जानने और मानने के लिए जिज्ञासा होनी चाहिए वही जीवन है।

इस अवसर पर मोहल्ले के साथ साथ नगर के श्रद्धालुगण भगवत कथा का ज्ञान को प्राप्त कर लाभ प्राप्त कर रहें हैं। सभी नगरवासियों से भी विशेष आग्रह है कि अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर भगवत कथा का श्रवण कर अपने जीवन को सफल बनाएॅ।

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