डाइबिटीज का कारण -हमारी आदतें और आलस्य: डॉ. अजय भाम्बी

होमो-सेपीयंस

होमो-सेपीयंस प्रजाति जिसका प्रतिनिधित्व विश्व का प्रत्येक नागरिक यानि हम और आप करते हैं मात्र तीस हजार साल पुरानी प्रजाति है।

इवोल्यूशनरी साइंटिस्टस ने हजारों साल के साइंटिफिक शोध के बाद यह तथ्य प्रकट किये हैं कि मनुष्य की आठ प्रकार की प्रजातियां डेढ़ लाख वर्ष पूर्व साउथ अफ्रीका के जंगलों में अस्तित्व में आयी थी।

उससे पहले मनुष्य के डी.एन.ए. से मिलता-जुलता मात्र चिंपांजी हुआ करता था। एक लाख वर्ष पूर्व आठ प्रजातियों में से कई समाप्त हो गयी और पचास हजार वर्ष पूर्व मात्र दो प्रजातियां बची उनमें से एक नेंथरल थे और दूसरे होमो-सेपीयंस।

नेंथरल प्रजाति लगभग एक लाख वर्ष तक इस पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में अपना अस्तित्व फैलाया लेकिन वो कई कारणों से होमो-सेपीयंस से हार गई। नेंथरल और होमो-सेपीयंस का डी.एन.ए. एक है।

हम इतिहास में पढ़ते हैं कि कभी ‘स्टोन ऐज’ हुआ करती थी और ‘आदि मानव’ ने पत्थर से हथियार बनाने का आविष्कार किया। वास्तव में हम जिसे ‘स्टोन ऐज’ बोलते हैं अब वैज्ञानिक मानते हैं कि ‘स्टोन ऐज’ जैसा कोई युग नहीं था।

नेंथरल प्रजाति के लोग बड़े सक्षम, मजबूत और गजब के बुद्धिमान थे। इसी प्रजाति के लोगों ने एक लाख वर्ष पूर्व ‘वुड़ ऐज’ की खोज की थी। ये लोग लकड़ी से हथियार बनाते थे। जैसे जंगल के पेड़ से लकड़ी की मजबूत से टहनी ली उसको छोटे-छोटे पत्थरों के प्रयोग से नुकीला बनाया और फिर उसी से तीर-कमान बनाया।

नेंथरल हों या होमो-सेपीयंस यानि हम, मूलतः हम सब आलसी जीव हैं। यह आलस्य की व्यवस्था हमारे डी.एन.ए. में बहुत गहरे में कोडिड है और आज भी हमें मौका मिले तो हम आलस्य की गोद में तुरन्त चले जाते हैं।

आप मात्र 15 दिन कुछ ना कीजिएगा और फिर जीवन का रूटीन पकड़ना आपके लिए आसान नहीं होगा और अगर आप तीन महिने बस बिस्तर पर पड़े रहें तो फिर शायद ही आप आलस्य की गोद से निकल पायें। इसको थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं।

होमो-सेपीयंस हों या नेंथरल ये सब शिकार पर जिंदा रहते थे और शिकार की तलाश तब करते थे जब भूख से पीड़ित होते थे। एक बार शिकार मिल गया तो कई दिनों तक की व्यवस्था हो जाती थी और कुछ करने को था नहीं। खाया-पीया और सो गये।

आज से तीस हजार साल पहले होमो-सेपीयंस जिसका शाब्दिक अर्थ होता है बुद्धिमान प्रजाति, ने नेंथरल को इस पृथ्वी से खदेड़ दिया यानि मार डाला। नेंथरल लोग जानवरों की तरह 50 – 60 लोगों को ग्रुप बनाकर रहते थे और उससे ज्यादा वो झेल नहीं पाते थे।

लाखों लोगों की संस्था बनाने के लिए मिथक या झूठ का सहारा लेना पड़ता है या वो मानना पड़ता है जिसे आप जानते नहीं हैं जैसे जो बुजुर्गों से सुना है तो मानते हैं। या उन किताबों में लिखा है जिनकी आपने कभी पड़ताल नहीं की और मानना एक परंपरा है और चूंकि यहां वैज्ञानिक तथ्य नहीं होते तो हम मानकर चलते हैं।

नेंथरल कम बुद्धिमान थे और शायद वैज्ञानिक भी। वो बिना माने आगे नहीं बढ़ते थे तो वो भीड़ से हार गये इसीलिए वो होमो-सेपीयंस से हार गये।

आज से तीस हजार वर्ष पूर्व जब एग्रीकल्चर की होमो-सेपीयंस को जानकारी नहीं थी तब उनके पेट भरने का साधन या तो शिकार थे या प्राकृतिक पेड़-पौधों से जो मिल जाये।

मान लीजिए कोई होमो-सेपीयन महिला तीस हजार वर्ष पूर्व किसी ब्लैक बैरी या आम के पेड़ के नीचे बैठी है और उसे सहसा एक आम खाने के बाद अंदाज हो अरे वाह! यह तो बहुत मीठा है तो वो पूरे दिन भर आम खा सकती है और जब तक आम के पेड़ पर से आम खत्म ना हो जायें यह उसका नियमित व्यायाम हो जायेगा।

आज भी आप किसी भी शादी में चले जायें जैसे ही वो बूफे या खाने के लिए बोलते हैं तो हम सब भद्र पुरूष, महिलाएं ऐसे टूटकर पड़ते हैं कि जैसे इससे पहले कभी खाना देखा नहीं। दरअसल यह हमारी प्रजाति के डी.एन.ए. की समस्या है कि हम कितने भी पढ़े-लिखे और समृद्ध खानदान के सुसंस्कृत क्यों ना हों हम भूखे भेडिए ही हैं।

ग्रह और डाइबिटीजः</p>

ये बड़ा मुश्किल है हमारे लिए जानना कि पहले ज्योतिष आया या मनुष्य। लेकिन इतना तय है कि ज्योतिष ने बीमारी की खोज तभी की होगी जब बीमारों की संख्या बढ़ने लगी होगी।

जन्म कुंडली में लग्न, लग्नेश, लग्न में स्थित ग्रह और लग्न को प्रभाव डालने वाले ग्रह का अध्ययन सर्वप्रथम करना चाहिए किसी भी रोग को जानने के लिए। अगर किसी भी कुंडली का लग्न या लग्नेश पीड़ित है तो व्यक्ति को देर-सबेर स्वास्थ्य की समस्या भी घेरने वाली है। कुछ बीमारियां वंशानुगत होती है और मधुमेह भी वंशानुगत की श्रेणी में आता है।

अब मान लीजिए एक प्रमुख परिवार के पूर्वजों की कोई महिला या पुरूष आम के बाग में बैठकर इतने आम खाता था और उनको पचाने के लिए ना तो व्यायाम करता था और ना ही उपवास करता था और ना ही ऐसी चीजें करता था जो इन सबका काट हो तब ये बीमारी अमुक बीमारी डी.एन.ए. में प्रवेश कर जाती है और आपका कसूर मात्र इतना है कि आप उस डी.एन.ए. की संतान है।

अगर कुंडली में शुक्र, केतु से या बृहस्पति केतु सहित अन्य कई कारणों से वंशानुगत क्रम में पीड़ित करता चला आ रहा है तो उस परिवार में पैदा होने वाले व्यक्ति को 90 प्रतिशत डाइबिटीज होने का चांस बन जाता है।

इस परिवार के व्यक्ति मूलतः आलसी होते हैं। व्यायाम से दूर भागते हैं और खाने-पीने पर कंट्रोल नहीं होता और आलस्य से पीड़ित होते हैं। वहां पर डाइबिटीज वंशानुक्रम में पीढ़ी दर पीढ़ी घटित होती रहती है।

ऐसे परिवार के व्यक्तियों को अधिकतर डाइबिटीज जल्दी उम्र में प्रगट हो जाती है और यदि इससे बच जाये तो जैसे ही उन पीड़ित ग्रहों की दशा आती है जिनके बारे में ऊपर लिखा गया है तो व्यक्ति डाइबिटीज की गिरफ्त में आ जाता है।

जब कुंडली में बृहस्पति तीसरे, छटे, आठवें, बारहवें स्थान में पीड़ित होता है तब भी डाइबिटीज होने की संभावना बनी रहती है चाहे ऐसा व्यक्ति वंशानुगत क्रम में आता हो या चाहे ना आता हो।

शुक्र जब नीच का हो, पीड़ित हो या तीसरे, छटे, आठवे और बारहवें स्थान में पीड़ित हो तब भी डाइबिटीज हो जाती है। अगर पहले ना हो तो 50 वर्ष की उम्र में होने के आसार बढ़ जाते हैं।

शुक्र, केतु मूलतः डाइबिटीज के ग्रह है लेकिन यदि कुंडली पीड़ित हो तो सारे ग्रह वो सारे रोग दे देते हैं जिससे संबंधित बॉडी के ऑर्गन शुरू से कमजोर हों या अनियमित जीवन से उनका नाश कर लिया हो।

डाइबिटीज से बचने के सनातन उपायः

हम होमो-सेपीयन अपनी आदतों और आलस्य के गुलाम है इसीलिए हर कल्चर ने इससे बचने के उपाय ढूंढे जैसे – योगासन। अगर आप रेगूलर योगासन करें तो उपर लिखे किसी भी कारण से डाइबिटीज नहीं हो सकती।

अगर आप अपने खानवान पर नियंत्रण रखें तब भी डाइबिटीज से बचा जा सकता है। और अगर आप आलस्य को अपना मित्र ना बनाये तो भी डाइबिटीज से बचा जा सकता है।

वरना ऐलोपैथी, आयुर्वैदिक, होमोपैथिक, यूनानी, सबने डाइबिटीज को जड़ से खत्म करने के परपंच किये हुए हैं जिसको हो जाती है वो जाती नहीं है। शुगर सारी उम्र नहीं जाती और शुगर व्यक्ति से निकल जाता है।

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