निजी शिक्षण संस्थाओं के भरोसे विद्यार्थियों का भविष्य, हो रहा मोटी रकम अदायगी

मनीष शर्मा:

मुंगेली: जिले में न जाने कितने निजि शिक्षण संस्थान अस्तित्व में हैं। इन निजी संस्थानों में मोटी फीस लेकर, बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दी जा रही है। एक समय था जब निजि शिक्षण संस्थान गिनती के थे और इनमें से अधिकांश का संचालन मिशनरी द्वारा किया जाता था।

शिक्षा को बना लिया गया व्यवसाय

मिशनरी को अनुदान मिलता था, इसलिये इसमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अधिक फीस नहीं देना पड़ता था। आज शिक्षा को व्यवसाय बना लिया गया है और शासन-प्रशासन मूक दर्शक बना बैठा है।शालाओं में गणवेश, डोनेशन, किताबों आदि की मारामारी से आम अभिभावक त्रस्त ही नजर आ रहा है।

पढ़ाई हो रही प्रभावित

शासकीय शालाओं के शिक्षकों को चुनाव, परिवार नियोजन आदि बेगार के कामों में उलझा दिया गया था, जिससे वहाँ की पढ़ाई प्रभावित हो रही है शासकीय शालाओं में शिक्षकों का ध्यान अब पढ़ाई की ओर पूर्व की तरह नहीं रह गया है।

औपचारिक दिशा-निर्देश

यह सब कुछ शासन-प्रशासन बखूबी जानता है। शासकीय स्तर पर निजि शिक्षण संस्थानों के लिये न जाने कितने महज औपचारिक दिशा-निर्देश जारी होते हैं, पर उनमें से कितनों का पालन हो पाता है, यह बात भी सभी के सामने है।

बता दें दसवीं और बारहवीं की परीक्षाएं सिर पर हैं। इनके परिणाम के आते तक निजि शिक्षण संस्थान तो मौन रहते हैं पर निजि स्तर पर कोचिंग के संचालकों द्वारा बच्चों के अच्छे प्रतिशत आने पर इसका श्रेय बटोरा जाता है।

पिछले कई सालों से इस तरह की कवायद के साथ ही शिक्षण संस्थानों की इस मामले में चुप्पी आश्चर्यजनक ही मानी जा सकती है। वैसे वे चुप इसलिये हैं क्योंकि वे इस बात को बेहतर जानते हैं कि पालक आखिर बचकर जायेगा कहाँ? एक नहीं तो दूसरी निजी संस्था में तो दाखिला करवायेगा ही।

जिला प्रशासन के द्वारा नहीं लिया जाता संज्ञान

एक यक्ष प्रश्न तो यह है कि निजि कोचिंग के संचालकों द्वारा श्रेय लेने की जो कवायद की गयी उस पर न तो जनप्रतिनिधि ही चिंतित नजर आते रहे हैं और न ही जिला प्रशासन के द्वारा ही संज्ञान लिया जाता है।

इसका कारण यह है कि निजि शिक्षण संस्थानों में अभिभावकों द्वारा मोटी फीस देकर बच्चों को पढ़ाया जाता है, फिर क्या वजह है कि शासकीय शाला की बजाय बच्चा किसी निजि कोचिंग में जाने की जिद करता है।

शिक्षा जैसे अहम मुद्दे के लिए जिला प्रशासन को चाहिये कि इस मामले में संज्ञान अवश्य ले। अगर किसी संस्था में कोई बच्चा अध्ययन कर रहा है तो कम से कम उस संस्था के शिक्षक पर तो कोचिंग पढ़ाने पर पाबंदी लगनी ही चाहिये।

एक बात समझ से परे है कि शासकीय शाला में चालीस बच्चों के बीच जो शिक्षक बच्चों को विषय समझाने में असफल रहता है वह निजि तौर पर कोचिंग के दौरान चालीस मिनिट में ही उस विषय में बच्चे को पारंगत कैसे बना देता है, मतलब साफ है कि शिक्षा को दुकान बनाने का अभियान परवान चढ़ रहा है।

अगर ऐसा नहीं किया जा सकता है तो बेहतर होगा कि जिले के जनप्रतिनिधि निजि कोचिंग संस्थानों को ही शासकीय शिक्षण संस्थान का दर्जा दिये जाने की बात विधानसभा में गुंजायमान करें, ताकि कम से कम अभिभावक तो कई दृष्टिकोणों से लुटने से बच सकें।

विडम्बना यही है कि जनप्रतिनिधि भी शिक्षा के मामलों में विधानसभा और संसद में मौन ही रहने में भलाई समझते हैं, जिससे शिक्षा का स्तर गिरना स्वाभाविक ही है।

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