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फिल्म ‘जाने भी दो यारो’,कुंदन शाह ने इस तरह बनाई थी

मुंबई:   कुन्दन शाह की फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ बहुत कम बजट में बनाई गई थी. यह फिल्म एफटीआईआई से पास उन दो दोस्तों के संघर्ष को बताती है जिन्होंने हैदराबाद में एक फोटो स्टूडियो खोला. कुंदन शाह ने साल 1983 में इस यादगार फिल्म का निर्माण ‘संयोगवश’ किया था.

शाह का दिल का दौरा पड़ने के कारण कुछ दिन पहले निधन हो गया. ‘एनएफडीसीसीसिनेमाजऑफइंडिया’ के साथ साल 2012 में एक साक्षात्कार में शाह ने फिल्म निर्माण से जुड़ी हुई बातों को याद करते हुए कहा था, ‘‘मेरे मन में यह बात साफ थी कि मैं एक हास्य फिल्म बनाना चाहता था. उस समय (1980 के दशक की शुरूआत में) मैं अकीरा कुरूसावा की ‘वन वंडरफुल संडे’ (1947) के आधार पर एक अन्य फिल्म लिख रहा था.

यह दो निर्धन प्रेमियों की कहानी है और इसमें बताया गया है कि दोनों एक साथ रविवार कैसे बिताते हैं.’’

उन्होंने बताया था, ‘‘मैने वह फिल्म नहीं देखी थी लेकिन मैं विचार से प्रेरित था और एक पटकथा लिखने का प्रयास कर रहा था. ‘जाने भी दो यारो’ इसी बीच तैयार हुई, इसलिए आप कह सकते हैं कि ऐसा संयोगवश हुआ.’’

जिस समय शाह ने 1976 में पुणे में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया (एफटीटीआई) से स्नातक किया उस समय बहुत ज्यादा अवसर नहीं होते थे. उन्होंने कहा था ‘‘उन दिनों टेलीविजन नहीं था और हम फिल्म उद्योग से जुड़ना नहीं चाहते थे.

मेरे विचार से, तब फिल्म निर्माता मनमोहन देसाई के पास 17 सहायक थे और किसी ने मुझे भी उनसे जोड़ने का प्रयास किया था. तब मुझे लगा था कि मैं उनका 18वां सहायक होता जो कि मैं बनना नहीं चाहता था. ’’

कुंदन शाह ने साक्षात्कार में कहा था ‘‘तब हमने सिनेमेटोग्राफर, एडिटर और अन्य को मिला कर एक समूह बनाया क्योंकि हम जानते थे कि संघर्ष तो करना ही है. हैदराबाद में इसका केंद्र था. धीरे धीरे सब इधर उधर चले गए और मैं मुंबई आ गया.’’ शाह के केवल दो मित्र .. रवि ओझा और राजेन्द्र शा वहीं रह गए और उन्होंने एक फोटो स्टूडियो खोला. ‘‘बाद में रवि एक बार मुंबई आया और हमने संघर्ष के दिनों की यादें साझा कीं. अगले दिन से मैंने कुरूसावा से प्रेरित हो कर एक पटकथा पर काम शुरू किया और ‘जाने भी दो यारो’ बनी.

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