वृंदावन का निधिवन जो आज भी लोगों के लिए बना है रहस्य

निधिवन में आज भी घर के खिड़की के दरवाजे शाम ढलते ही बंद हो जाते है

भारत में कई ऐसी जगह जो अपने अतीत के रहस्यों को लेकर काफी प्रसिद्ध है। जिन्हे जानने की लालसा हर व्यक्ति के मन में होती है। लेकिन कुछ ऐसे जगह हैं, जहां का रहस्य आज भी रहस्य ही बना हैं। कितनी कोशिशें नहीं की गई कि इस रहस्य से पर्दा उठ जाएं, लेकिन सफलता किसी को नहीं मिली हैं।

ऐसा ही एक जगह है वृंदावन । इसको कौन नहीं जानता वहां की धरती इतनी पावन है कि उसके रज को अपने मांथे से लगाने के बाद ही आपके सारे दुख, कष्ट्र दूर हो जाते हैं। ये स्थान बेहद पवित्र, धार्मिक और रहस्यमय है।

लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं,वृंदावन से जुड़ा निधिवन जहां आज भी श्रीकृष्ण अपनी राधा और गोपिय़ों के साथ रास रचाने के लिए आते हैं। इसके रहस्य को जानने की कई बार कोशिश की गई।

क्या सही में राधा कृष्ण गोपियों के साथ आते हैं। लेकिन जो हुआ उसे सुनकर आप भी अंचभित हो जाएंगे। निधिवन में शाम के 5 बजते ही वहां पर लोगों को जाना प्रतिबंधित है।

निधिवन के आसपास बसे घरों जिनकी खिड़की की दिशाएं निधिवन की ओर हैं। वो शाम को 5 बजे के बाद उस दिशा की खिड़की को बंद कर लेते हैं। क्यों कि कहा जाता है कि जितने लोगों ने वहां गए वो वापस नहीं आए या लौटे भी तो उनका संतुलन पूरा बिगड़ चूका था।

इंसान ही नहीं बल्कि जानवर भी दिन ढलते ही निधिवन को छोड़ कर दूसरे जगह अपना बसेरा जमा लेते हैँ। इसलिए निधिवन की संध्या आरती दिन पंडित के द्वारा दिन ढलने के पहले कर ली जाती है।

निधिवन के अंदर ही है ‘रंग महल’ जिसके बारे में मान्यता है की रोज रात यहां पर राधा और कन्हैया आकर रास रचाते हैं। रंग महल में राधा और कन्हैया के लिए रखे गए चंदन की पलंग को शाम सात बजे के पहले सजा दिया जाता है।

पलंग के बगल में एक लोटा पानी, राधाजी के श्रृंगार का सामान और दातुन संग पान रख दिया जाता है।सुबह पांच बजे जब ‘रंग महल’ का पट खुलता है तो बिस्तर अस्त-व्यस्त, लोटे का पानी खाली, दातुन कुची हुई और पान खाया हुआ मिलता है। रंगमहल में भक्त केवल श्रृंगार का सामान ही चढ़ाते है और प्रसाद स्वरुप उन्हें भी श्रृंगार का सामान मिलता है।

पेड़ों की खासियलगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत होते हैं। यहां लगे तुलसी के पेड़ जोड़े में हैं।

इसके पीछे यह मान्यता है कि जब राधा संग कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं।

साथ ही एक अन्य मान्यता यह भी है की इस वन में लगी तुलसी की कोई भी एक डंडी नहीं ले जा सकता है। लोग बताते हैं कि जो लोग भी ले गए वो किसी न किसी आपदा का शिकार हो गए। इसलिए कोई भी इन्हें नहीं छूता।

वन के आसपास बने मकानों में खिड़कियां नहीं हैं। यहां के निवासी बताते हैं कि शाम सात बजे के बाद कोई इस वन की तरफ नहीं देखता। जिन लोगों ने देखने का प्रयास किया या तो अंधे हो गए या फिर उनके ऊपर दैवी आपदा आ गई।

जिन मकानों में खिड़कियां हैं भी, उनके घर के लोग शाम सात बजे मंदिर की आरती का घंटा बजते ही बंद कर लेते हैं। कुछ लोगों ने तो अपनी खिड़कियों को ईंटों से बंद भी करवा दिया है।

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