सरकारी स्कूल बेहाल, कहीं चूहों का शिकार तो कहीं लकड़ी ढो रहे बच्चे

राज शार्दुल

कोण्डागांव।

सरकार शिक्षा में सुधार के नाम पर आदिवासी अंचल में अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाती रही हैं सरकारी अमला बस्तर में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के अनेक दावे करते हुए लंबे चौड़े आंकड़े पेश कर रही है जब की स्थिति यहां कुछ और ही बयां करती है ऐसे ही बड़े राजपुर ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्र में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला जहां स्कूली बच्चे खाली पड़े खेतों में चूहों का शिकार कर रहे थे।

वहीं बच्चियां ईंधन की जुगाड़ के लिए सिर पर लकड़ी का बोझा ढो रही है तो कहीं पेयजल की जिम्मेदारी भी इन्हीं नन्हे कंधों पर दिखाई दे रहा है। ग्राम बांसकोट मे स्कूली समय में यह देखने को मिला तो वहीं शामपुर मे छुट्टी के दिन यह नजारा देखने को मिला।

ऐसा भी नहीं है कि सरकारी तंत्र बस्तर में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए प्रयास ना किया हो। प्रयास तो अनेक बार अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से किया गया किंतु निचले स्तर पर अधिकारी कर्मचारियों की लापरवाही के चलते सरकारी योजनाओं को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका जिसके चलते बस्तर में शिक्षा के नाम पर चल रही कई योजनाएं केवल कागजों पर दौड़ रही है।

गरीबी ने बचपन छीन लिया

एक ओर शहरी सम्पन्न बच्चे मोबाइल, कम्प्यूटर वीडीओ गेम्स में अपना आनंद उठाते हैं तो वहीं आदिवासी एवं गरीब बच्चे कहीं चूहों का शिकार तो कहीं कीचड़ में उतरकर मछलियों के लिए जाल फेंकते दिखाई देते हैं। आदिवासियों अंचल में अक्सर यह देखने को मिलता है जहां स्कूली बच्चे फावड़ा- कुदाली लेकर चूहों की शिकार में निकल जाते हैं ,बच्चे कभी गुलेल पकड़ कर जंगल की ओर पक्षियों का शिकार कर रहे होते हैं तो कहीं जाल फेंककर मछलियों का शिकार कर रहे होते हैं।

धान की फसल कटने के बाद आजकल खेत बंजर हैं जहाँ खेतों में आदिवासियों को चूहों का शिकार करते देखा जा सकता है। ऐसा ही नजारा ग्राम बांसकोट के खेतों में देखने को मिला जब स्कूली बच्चे चूहे का शिकार कर रहे थे। चूहे का शिकार करना इतना आसान भी नहीं है किंतु यहां मासूम बच्चे हर हाल में चूहों का शिकार कर लेते हैं और तब तक हार नहीं मान लेते जब तक 10- 20 चूहे लेकर घर को नहीं लौटते ।

कैसे करते हैं चूहों का शिकार

आजकल खेतों में धान की कटाई हो चुकी है। बस्तर में ज्यादातर एक फसली व्यवस्था है इस समय खेत बंजर पड़े हैं। खेतों के मेड़ों पर चूहों का डेरा होता है। आदिवासी रमलू राम एवं सरादू राम ने बताया कि पहले चूहे का बिल ढूंढा जाता है। जब चूहे का दो बिल मिल जाए तो चूहा पकड़ना आसान हो जाता है। एक बिल को मिट्टी से बंद कर दिया जाता है तथा दूसरे बिल से धुंआ की धूनी दी जाती है , मिर्च डालकर भी धूनी देते हैं। जिससे चूहों का दम घुटने लगता है तथा चूहे एक-एक कर बाहर निकलना शुरू कर देते हैं । यहीं से चूहों का शिकार होता है ।

दिन भर भी लग जाता है चूहों के शिकार में

जब धुएं से चूहे बाहर नहीं आते तो मिट्टी की खुदाई की जाती है। मिट्टी खोदते कभी-कभी तो पूरा दिन ही बीत जाता है । भले ही आदिवासी भूखे प्यासे हो किंतु जब तक चूहे ना पकड़ ले घर को नहीं लौटते।

घर में लजीज व्यंजन बनता है

आदिवासियों मे पूर्वजों से चूहों को सपरिवार चाव से खाने की परंपरा है । इसके अलावा छोटी मछलियां एवं पक्षियों का व्यंजन भी काफी चाव से खाते आ रहे हैं। बड़ों का अनुशरण करते हुए बच्चे भी चूहों का शिकार करते हैं तथा उससे लजीज एवं जायकेदार व्यंजन बनाया जाता है । इसे भून कर भी खाने की परंपरा है। कुछ लोग बारिश में केकड़ा मेंढक को भी पकड़ कर सब्जी के रूप में उपयोग में लाते रहे हैं।

आदिवासी लड़कियां जंगल से इंधन की जुगत करती है। सुबह-सुबह जंगल की ओर जा कर सूखी लकड़ियों को इकट्ठा कर गट्ठा बनाया जाता है तत्पश्चात सिर पर बोझा बनाकर उसे घर तक पहुंचाना पड़ता है। इसके लिए उन्हें 4 से 5 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है । खासकर छुट्टियों के दिनों में तो यह कार्य करना ही पड़ता है । लेकिन कभी कभी जरूरत पड़े तो स्कूल के दिनों में भी ऐसा दृश्य देखा जा सकता है।

अवश्य कार्यवाही होगी –जिला शिक्षा अधिकारी

जिला शिक्षा अधिकारी कोण्डागांव राजेश मिश्रा ने पहले तो इस प्रकार की लापरवाही से इनकार किया किंतु बाद में जब उनको वीडियो फुटेज एवं फोटो होने की बात कही गई तो उन्होंने कहा कि वह अभी छुट्टी पर हैं। जब सोमवार को वापस लौटेंगे तो इस पर जांच करेंगे तथा अवश्य ही कार्यवाही करेंगे।

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