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अयोध्या का महात्म्य स्वर्ग से कम नहीं-देवत्व नगरी यूं ही नहीं कहा गया इसे

अयोध्या नगरी को शास्त्रों में देवत्व नगरी के नाम से सम्बोधित किया गया है। अयोध्या नगरी की वास्तु कला  का उल्लेख करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि यह नगरी आठ चक्रों और नौ द्वारों से सुशोभित है। स्वर्ण की भांति चमकने वाली यह नगरी दिव्य ज्योति से घिरी हुई है।

रायपुर: अयोध्या नगरी को शास्त्रों में देवत्व नगरी के नाम से सम्बोधित किया गया है। अयोध्या नगरी की वास्तु कला  का उल्लेख करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि यह नगरी आठ चक्रों और नौ द्वारों से सुशोभित है। स्वर्ण की भांति चमकने वाली यह नगरी दिव्य ज्योति से घिरी हुई है।

अयोध्या का वही स्थान हैं जो महत्व मधुरा, मायानगरी अर्थात हरिद्वार, काशी जी मतलब कांची जी, अवन्तिका मतलब उज्जैन का है।

भारत वर्ष की पांच पुण्य पुरियों में इसका स्थान अंकित है। इस नगरी को मोक्षदायिनी पुरी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक संदर्भ के अनुसार महाराज मनु  अपना कार्यकारी कार्यालय बनाने के उद्देश्य से बैकुंठ से इसे धरा पर लाये थे।

इस नगरी के महात्म्य के लिये यहां तक कहा गया कि अयोध्या नगरी ब्रह्मालोक, इंद्रलोक, विष्णुलोक और गोलोक सभी लोकों का मूल है। ऐसा उल्लेख अर्थववेद में मिलता है। तभी तो भगवान ने अपने अवतार के लिए इस नगरी का चयन किया था।

लाखों वर्ष पूर्व अयोध्या राजा मनु की राजधानी थी।  सभी पुरियों में श्रेष्ठ होने के कारण भगवान पुरुषोत्तम राम की जन्मभूमि यह कहलाई। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान राम का जन्म इस नगरी में हुआ था, उस समय इस नगरी का विस्तार लगभग ८४ कोस का था। इसकी चार दिशाओं की सुरक्षा चार पर्वत कर रहे थे।

पूर्व में श्रृंगराद्रि पर्वत था, तो पश्चिम में नीलाद्रिक पर्वत से इस दिशा की रक्षा हो रही थी। उत्तर में मुक्तावद्रि और दक्षिण में मणिकूट जिसे आज मणिपर्वत का नाम दिया गया है।  इन पर्वतों ने अयोध्या नगरी की बाहरी शत्रुओं से सदैव रक्षा की।

ऐसी मान्यता है कि अयोध्या नगरी की पुनखोज राजा विक्रमादित्य ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान राम दिव्य धाम चले गए थे, उस समय अयोध्या की रौनक भी जाती रही थी। उस समय यहां के धार्मिक स्थल, मठ, मंदिर सब अपने आभा खो चुके थे। संपूर्ण नगरी जंगल ही जंगल हो गई थी।

समय व्यतीत होने पर इस नगरी को उसकी शोभा वापस महाराज ऋषभक ने लौटाई थी। अयोध्या के आध्यात्मिक स्वरुप का वर्ण राजा विक्रमादित्य  के शासनकाल में भी मिलता है। कुछ शास्त्रों के अनुसार त्रेता युग के समापन के साथ्ही अयोध्या भी लुप्त हो गई थी, राजा विक्रमादित्य ने इसे पुन: ढूंढ लिया।

अयोध्या की तलाश में राजा विक्रमादित्य को मार्ग में तीर्थराज प्रयाग मिल गए थे। कहा जाता है कि तीर्थराज प्रयाग को अयोध्या की जानकारी थी, और उन्होंने राजा विक्रमादित्य को अयोध्या का मार्ग बताया था।  मार्ग का स्मरण रखने के लिए राजा विक्रमादित्य ने मार्ग चिन्ह भी लगए थे, जिन्हें बाद में विक्रमादित्य भूल गए।  ऐसे में उन्होंने इस योगी से सहायता मांगी, और योगी ने उन्हें एक युक्ति सुझाई की वो एक गाय और बछड़े को खुला छोड़ दें।

जब गाय और बछड़ा अयोध्या नगरी पहुंचेगा तो गाय के स्तन से दूध स्वयं ही बहने लगेगा। इस युक्ति का पालन कर राजा विक्रमादित्य ने ऐसा ही किया।  एक स्थान पर जाकर गाय के स्तन से स्वत: दूध बहने लगा और बछड़ा दूध का सेवन करने लगा। यह देख राजा विक्रमादित्य को समझ आ गया कि यही अयोध्या नगरी है।

शास्त्रों में अयोध्या नगरी का वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है। इस नगरी  के कुल परिक्रमा १४ कोस की है। नगरी के एक कोने पर राम कोट, दूसरे पर सरयू नदी। रामकोट में कुल २० द्वार बने हुए थे। मुख्य द्वार के रक्षक हनुमान जी थे। दायें द्वार के रक्षक सुग्रीव, अंगद थे। पूर्व कोण में एक मंदिर्र था।

पश्चिम कोण के रक्षक दधिचक्र थे। अयोध्या नगरी के महल के उत्तरी कोण के रक्षक विभीषण जी थे। दक्षिणी कोण के रक्षक जामवंत जी और केसरी जी थे। राजकोट के अंदर कई छोटे महल थे। जिसमें मुख्य रुप से कनक भवन, रत्न सिंहासन भवन, श्रंगार भवन, कोप भव, सीता रसोई, भरत राजमहल, रंगमहल, राज कचहरी और इच्छा भवन था।

जिस प्रकार काशी नगरी शिव जी के त्रिशुल पर टिकी है, ठीक उसी प्रकार यह विष्णु जी के सुदर्शन चक्र पर टिकी हुई है। अयोध्या सदैव शत्रुओं के द्वारा अविजित रही है।  अयोध्या को ब्रह्मा जी, विष्णु जी और महादेव महेश जी सम्मिलित स्वरुप कहा गया है। ब्रह्मा जी स्वयं यहां भ्रमण करते है। यहां के ब्रहाकुंड की स्थापना भी स्वयं ब्रह्मा जी ने की थी। यह न केवल हिन्दुओं की अगाध श्रद्धा का केंद्र है। बल्कि इसे शैव, शाक्त, बौद्ध और जैन सभी धर्मों ने पवित्र स्थान माना है।

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री
8178677715, 9811598848
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