जिला न्यायाधीश द्वारा पुलिस अधिकारी के खिलाफ टिप्पणी एवं विभागीय जांच के आदेश को उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक ठहराया एवं निरस्त किया

जिला न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए याचिका कर्ता की याचिका को स्वीकृत किया गया

बिलासपुर। याचिकाकर्ता चंदन सिंह प्रधान आरक्षक / जांच अधिकारी के द्वारा उर्गा पुलिस स्टेशन कोरबा में पदस्थी के दौरान अवैध शराब की जप्ती कर दो अभियुक्तों के खिलाफ धारा 34 35 आबकारी अधिनियम के तहत कार्यवाही की गई थी दोनो अभियुक्तों द्वारा जिला न्यायालय कोरबा में जमानत आवेदन प्रस्तुत किया गया और कहा गया कि प्रधान आरक्षक को धारा 54 एवं 55 आबकारी अधिनियम के अंतर्गत शराब जप्ती का अधिकार नहीं है. जिला न्यायालय कोरबा के द्वारा दोनो अभियुक्तों को जमानत प्रदान की गई. साथ ही साथ जिला न्यायालय के न्यायधीश द्वारा इस बात का जिक्र किया गया और कहा गया कि प्रधान आरक्षक द्वारा किये गये अवैधानिक कार्यवाही के कारण ही अभियुक्तगण / आवेदकगण जमानत प्राप्तः करने के अधिकारी हुए है इस कारण आदेश पत्र की प्रतिलिपि पुलिस अधिक्षक कोरबा एवं वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को प्रधान आरक्षक के लिये विभागीय कार्यवाही हेतु प्रेषित किया जाये।

जिला न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश की वैधानिकता को माननीय उच्च न्यायालय में चंदन सिंह अपने अधिवक्ता संदीप दुबे के माध्यम से चुनौती दी गई और कहा गया कि किसी प्रकार का कलंकित आदेश जो उसके हितों के विपरीत है जिला न्यायालय को ऐसे आदेश पारित करने का एक तरफा अधिकार नहीं है। इस संबंध में बहुत से उच्चतम न्यायालय का न्याय दृष्टात पेश कर उच्च न्यायालय को बताया गया कि बिना याचिकाकर्ता के पक्ष को सुने इस प्रकार का आदेश दिया जाना मनमानापूर्ण, भेदभावपूर्ण एवं दुषित है। माननीय उच्च न्यायालय ने सुनवाई करते हुए या माना कि प्रकरण के परिस्थिति को देखते हुए अभियुक्तों को जमानत दिया जाना उचित माना जा सकता है किंतु माननीय जिला न्यायधीश महोदय द्वारा बिना याचिकाकर्ता को सुने विभागीय जांच का आदेश दिया जाना गलत है। विभिन्न उच्चतम न्यायालय के आदेशों को ध्यान में रखते हुए माननीय उच्च न्यायालय द्वारा जिला न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए याचिका कर्ता की याचिका को स्वीकृत किया गया।

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