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दो टूक (श्याम वेताल) : नक्सलवाद से युद्ध का अंतिम चरण ऐसा…?

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श्याम वेताल

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने राज्य विधानसभा में वर्ष 2018-19 का वार्षिक बजट पेश करने के दौरान कहा था कि नक्सलवाद के साथ युद्ध अब अंतिम चरण है. हमें विश्वास है कि जल्दी ही इस समस्या को हम जड़ से समाप्त कर देंगे. मैं उन सभी जांबाज और सुरक्षाकर्मियों को नमन करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देना चाहता हूं जिन्होंने इस युद्ध में बलिदान दिया है.

बजट भाषण में मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया यह आश्वासन वास्तव में सुकून देने वाला था. बस्तर समेत पूरे प्रदेश और देश के लिए भी यह एक राहत भरा वादा था. विगत 10 फरवरी को विधानसभा में मुख्यमंत्री ने जब कहा कि नक्सलवाद के साथ युद्ध अंतिम चरण में है तो सचमुच सभी को ऐसा लगा था कि अब निर्दोष जवानो की अकाल मृत्यु नही होगी. लेकिन एक महीने बाद ही फिर 9 जवानों की जिंदगी का अंत हो गया और हम फिर श्रद्धांजलि – मोड में आ गए और नक्सलियों को कोसने लगे.

आखिर, ये सिलसिला कब टूटेगा? वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव के लगभग 6 महीने पहले झीरम जैसा भयानक हत्याकांड हो गया था जिसमें कांग्रेस के बड़े नेता नक्सली – दरिंदगी के शिकार हुए थे. उस समय भी छत्तीसगढ़ सरकार ने बड़ी-बड़ी बातें की थी कि अब नक्सलियों को सिर नहीं उठाने देंगे, नक्सलवाद का खात्मा करके रहेंगे. एन आई ए जांच, सी बी आई जांच करेंगे. नक्सलियों को उनकी मांद में घुसकर मारेंगे. और भी बहुत दिलेर वादे किए गए. फिर भी राज्य की जनता ने तीसरी बार आप को मौका दिया कि आप ने जैसा कहा है, वैसा कर दिखाएंगे. शोकग्रस्त कांग्रेस अपने बड़े नेताओं के शहीद हो जाने से इतने सन्न थे कि राज्य की जनता से अपने पक्ष में पूरा समर्थन भी नहीं मांग सके. नतीजा यह हुआ कि उन्हें फिर 5 साल के लिए विपक्ष में बैठना पड़ा. पूरे 5 साल उन्हें यह ग्लानि थी कि वह अपने शहीद नेताओं के हत्यारों को सबक नहीं सिखा सके.

बहरहाल, नक्सली हमले में एक भी सुरक्षाकर्मी की जान जाती है तो वह हजार मौतों के बराबर होती है. जबकि छत्तीसगढ़ में 2013 के बाद भी सुरक्षाकर्मियों पर नक्सली हमलों का सिलसिला थमा नहीं. छिटपुट – छिटपुट हमले होते रहे और सुरक्षाकर्मी शहीद होते रहे.

हर नक्सली हमले के बाद सरकार की विफलता का कारण एक ही बताया जाता है. वह है खुफिया तंत्र का फेल होना. यदि खुफिया तंत्र सिर्फ फेल होने के लिए ही बना है तो बस्तर में उसकी जरूरत ही क्या है? कई बार यह भी कहा जाता है कि खुफिया तंत्र ने ‘अलर्ट’ दे दिया था फिर भी चूक हो जाती है… ऐसा क्यों होता है… यह समझ से परे है.

आज सुकमा जिले में किस्टाराम के गांव पलोडी में आई ई डी ब्लास्ट में सी आर पी एफ के 9 जवान शहीद हो गए और कुछ घायल भी हुए. इस बेहद दर्दनाक घटना ने एक बार फिर पूरे प्रदेश की जनता का मन खट्टा कर दिया. इस घटना में शहीद हुए जवान मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, असम, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक के हैं. क्या गुजरेगी उन परिवारों पर जिन्होंने अपने बेटे खोए हैं? समझ में नहीं आता कि छत्तीसगढ़ का यह कलंक कब दूर होगा? आशंकित मन प्रश्न करता है कि क्या छत्तीसगढ़ सरकार पूर्ण इच्छा शक्ति के साथ नक्सलवाद के खात्मे के लिए तैयार है या फिर खत्म करने का वचन देना मात्र अभिनय हैं ? अभिनय सच जैसा हो सकता है लेकिन सच नहीं होता. राज्य की जनता यह जानती है लेकिन वह कुछ नहीं कर सकती. सरकार के लोगों के सूखे आंसू जनता को खूब दिखते हैं. लेकिन जनता के हाथ में फ़िलहाल ऐसा कुछ नही है. जिससे वह अपने गुस्से को दिखा सके. हां, 8 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में वह अपने गुस्से का प्रदर्शन वोटों के जरिए कर सकती है.

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