इस बुजुर्ग महिला ने 30 साल में कर दिया 100 से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार

वे बीते 30 साल से लावारिस शवों को अपने घर के सामने रखवाकर उन्हें ससम्मान विदाई देने के साथ ही कफन का कपड़ा व क्रियाकर्म के लिए पैसे भी देती हैं

बिलासपुर। अस्पतालों में लावारिस शवों को कर्मचारी बिना परंपराओं का निर्वहन किए मुक्तिधाम में दफन कर देते हैं। वहीं सिम्स में ऐसा नहीं होता है, क्योंकि 82 साल की कृष्णादेवी इसका ख्याल करती हैं।

वे बीते 30 साल से लावारिस शवों को अपने घर के सामने रखवाकर उन्हें ससम्मान विदाई देने के साथ ही कफन का कपड़ा व क्रियाकर्म के लिए पैसे भी देती हैं। बिना किसी के सहयोग से वे घर में बने मंदिर से होने वाली आय का उपयोग इस नेक काम में करती हैं।

समाज में अंतिम विधि के बाद अपने दरवाजे पर अर्थी रखना अशुभ माना जाता है। इसके बाद भी सिम्स के पीछे गोंड़पारा निवासी कृष्णादेवी सभी सामाजिक कुरीतियों और ऐसी सोच को किनारे कर स्वयं ही कफन देकर अंतिम विधि की पूजा करती हैं।

सिम्स से पहले था यहां धर्म अस्पताल


उनके पोते गोपाल कृष्ण यादव ने बताया कि सिम्स से पहले यहां धर्म अस्पताल था। उस समय वहां से हमेशा ही कोई न कोई लावारिस शव उनके दरवाजे के सामने से अस्पताल कर्मी ठेले में ले जाते दिख जाते थे।

उनकी ससम्मान अंतिम विदाई देने का बीड़ा उनकी दादी कृष्णादेवी ने उठाया। इसके साथ ही कर्मचारियों को पैसे इसलिए देती हैं ताकि वे मुक्तिधाम में भी परंपराओं का निर्वहन करते हुए उनका कफन-दफन करें।

जातिबंधन से दूर सभी को देती है कफन

सिम्स बनने के बाद भी यह सिलसिला लगातार जारी है। मन को मिलता है सुकून कृष्णादेवी जाति बंधन से दूर सभी के लिए कफन देती हैं। उनका कहना है कि इससे मन को सुकून मिलता है और यह हमारा सामाजिक दायित्व भी बनता है।

सभी का सम्मान होना चाहिए, चाहे वे दुनिया को अलविदा ही क्यों न कह चुके हों। पति ने की थी शुरुआत कृष्ण देवी के पति मांगीलाल महाराज ने इसकी शुरुआत की थी। उनके निधन के बाद वे इस कार्य को कर रही हैं।

अभी तक 100 लावारिस शवों को वे कफन दे चुकी हैं। सुहागन के लिए भी इंतजाम वे सुहागन महिला को अंतिम विदाई देने खास इंतजाम रखती हैं। लाल साड़ी, सिंदूर, च़ूडी देकर विदा करती हैं। इसकी पूर्ति वे घर में बने छोटे-से शीतला मंदिर से होने वाली आय और चढ़ावे में मिली साड़ी से करती हैं।

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