खबर जरा हटके: मजहबों का मेल कराती दिवाली

– श्याम वेताल
पिछली बार की तरह इस बार भी विज्ञापन से ही अपनी बात शुरू करता हूं. जी हां… मराठी टीवी पर एक विज्ञापन देखा जा सकता है जो अपने प्रोडक्ट का प्रमोशन करने के साथ ही सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक एकता का सहज उदाहरण पेश करता है.
जी मराठी पर चलने वाला यह विज्ञापन मोती साबुन का है. आगे बढ़ने से पहले यह बताना जरूरी है कि महाराष्ट्र में दीवाली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दीवाली भी कहते हैं के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करने की परंपरा है. इस दिन स्नान से पूर्व सुगंधित तेल की मालिश की जाती है और स्नान के समय सुगंधित साबुन का प्रयोग किया जाता है. इसके बाद मंदिर भी जाते हैं और वहां से लौटने के बाद दीवाली के निमित्त घर में जो खाद्य पदार्थ बनते हैं, उन्हें नाश्ते के तौर पर खाया जाता है.
अब लौटते हैं विज्ञापन की ओर. विज्ञापन में दिखाते हैं, एक गृहस्थ को. वह कहता है अभी तक सब सो रहे हैं? अलम काका सोसाइटी छोड़कर चले गए क्या? फिर वह गृहस्थ अपने बेटे को लेकर सोसाइटी में हर घर के दरवाजे को खटखटाता है. खटखटाते समय उसके हाथ में मोती साबुन दिखाया जाता है ऐसा करते हुए वह बच्चा बोलता है उठिए उठिए- दीवाली आ गयी, मोती स्नान का समय हो गया. सभी दरवाजों पर खटखटाने के दौरान एक दरवाजे से वही अलम काका बाहर निकलते दिखते हैं. उन्हें देखकर गृहस्थ बोलता है अलम काका अब आपकी परंपरा कायम रहेगी. उस गृहस्थ के यह कहने का तात्पर्य यह रहा कि अलम काका जो काम करते रहे वह काम उसका बेटा हर साल दीवाली पर करेगा.
इस विज्ञापन में दिल को छूने वाली बात यह है कि हिंदुओं की सोसाइटी में रहने वाले मुसलमान अलम काका हिंदू त्यौहार को न केवल मनाते हैं बल्कि इतना रच-बस जाते हैं कि दूसरों को सुबह सवेरे जगाने का भी काम करते हैं. सांप्रदायिक सद्भाव का यह अनुपम उदाहरण है अलम काका को काका कहकर उस गृहस्थ ने अपनत्व का बोध कराया. दूसरे धर्म का होने का रंच मात्र भी प्रदर्शन नहीं दिखा.
वास्तव में ऐसे विज्ञापनों का ना केवल संज्ञान लिया जाना चाहिए बल्कि इसे सभी भाषा भाषियों तक पहुंचाया जाना चाहिए ताकि आज की पीढ़ी को अपनी परंपरा और सामाजिक समरसता का बोध हो सके जो साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाने में सहायक बन सके.

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